ओडिशा सीमा से लगे गाजीमुड़ा में शिक्षा व्यवस्था बदहाल, मध्यान्ह भोजन और शौचालय के लिए रोज तय करना पड़ता है एक किलोमीटर का सफर
मैनपुर। एक ओर छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के दावे कर रही है और राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की शिक्षा रैंकिंग में सुधार का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड के ओडिशा सीमा से लगे दूरस्थ वनांचल ग्राम गाजीमुड़ा की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। यहां प्राथमिक शाला का भवन वर्षों से जर्जर होने के कारण बच्चों की पढ़ाई वन विभाग के एक उधार के भवन में कराई जा रही है। सरकारी अभिलेखों में प्राथमिक शाला गाजीमुड़ा दर्ज है, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव की कहानी बयां करती है।
वर्तमान में स्कूल में 26 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इन्हें न तो पर्याप्त कक्षाएं उपलब्ध हैं और न ही शौचालय, पेयजल तथा सुरक्षित परिसर जैसी बुनियादी सुविधाएं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि स्कूल जतन योजना के तहत नए भवन की स्वीकृति मिलने के बावजूद निर्माण कार्य पिछले चार वर्षों से अधूरा पड़ा है। अधूरा भवन धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है और उसके साथ बच्चों का भविष्य भी अधूरा दिखाई देने लगा है। गरियाबंद जिले में स्कूल जतन योजना के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और अधूरे कार्यों को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
मध्यान्ह भोजन के लिए रोज एक किलोमीटर पैदल

स्कूल की छात्रा सुनतीला बताती हैं कि वह पिछले दो वर्षों से इसी स्कूल में पढ़ रही हैं। उनके अनुसार पढ़ाई के दौरान सबसे अधिक परेशानी शौचालय और मध्यान्ह भोजन को लेकर होती है।
“हम जिस भवन में पढ़ते हैं वहां न बाथरूम है और न ही भोजन की व्यवस्था। खाना खाने और शौचालय जाने के लिए हमें पुराने स्कूल भवन तक जाना पड़ता है। वह करीब 500 मीटर दूर है। आने-जाने में रोज लगभग एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।”
सुनतीला ने बताया कि बारिश के दिनों में जिस भवन में कक्षाएं लगती हैं, उसकी छत से पानी टपकता है। ऐसे में पढ़ाई बाधित हो जाती है और बच्चों को सुरक्षित स्थान तलाशना पड़ता है।
नवीन शिक्षा सत्र को शुरू हुए लगभग महीना बीतने को आया है अब तक गणवेश नहीं मिला है
नवीन शिक्षा सत्र शुरू हुए करीब एक माह बीत चुका है, लेकिन ग्राम गाजीमुड़ा प्राथमिक शाला के विद्यार्थियों को अब तक निःशुल्क स्कूल गणवेश (यूनिफॉर्म) नहीं मिल सका है। शासन की योजना के अनुसार कक्षा 1 से 8 तक के पात्र विद्यार्थियों को शिक्षा सत्र की शुरुआत में ही दो जोड़ी गणवेश उपलब्ध कराया जाना है, ताकि सभी बच्चे समानता के साथ विद्यालय पहुंच सकें। लेकिन सीमावर्ती इस गांव के 26 बच्चे आज भी पुराने कपड़ों में स्कूल आने को मजबूर हैं। स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि भवन की समस्या, मूलभूत सुविधाओं के अभाव और अब गणवेश वितरण में देरी ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है। समय पर गणवेश नहीं मिलने से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है और शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
सीमा क्षेत्र के स्कूल अब भी उपेक्षा के शिकार
गाजीमुड़ा जैसे गांव नक्सल प्रभावित और ओडिशा सीमा से लगे दुर्गम क्षेत्रों में आते हैं। यहां शिक्षा ही बच्चों के भविष्य को नई दिशा दे सकती है, लेकिन अधूरी आधारभूत सुविधाएं और लंबित निर्माण कार्य ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने रखते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्वीकृत भवन समय पर पूरा हो जाता तो बच्चों को सुरक्षित वातावरण, शौचालय, रसोई और बेहतर कक्षाएं मिल सकती थीं।
अब ग्रामीणों और अभिभावकों की मांग है कि अधूरे भवन का निर्माण शीघ्र पूरा कराया जाए और बच्चों को मूलभूत सुविधाओं से युक्त स्थायी विद्यालय उपलब्ध कराया जाए, ताकि सीमावर्ती क्षेत्र के विद्यार्थियों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार व्यवहारिक रूप से मिल सके।
जिला शिक्षा अधिकारी बोले- जांच कराएंगे, गणवेश उपलब्ध होते ही वितरित किए जाएंगे
इस संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर ने कहा, “मामले की जानकारी मिली है। मैं इस पूरे विषय की जांच कराऊंगा। स्कूल भवन निर्माण कार्य किस कारण से अधूरा है, इसकी भी जानकारी लेकर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। जहां तक गणवेश वितरण का सवाल है, प्राथमिक विद्यालयों के लिए अभी गणवेश हमारे पास प्राप्त नहीं हुआ है। जैसे ही गणवेश उपलब्ध होगा, सभी पात्र विद्यार्थियों को तत्काल वितरित किया जाएगा।”





