लाल आतंक खत्म, पर विकास अधूरा: छोटे गोबरा में टपकती छत और सीलन भरे फर्श पर पढ़ने को मजबूर नौनिहाल
गरियाबंद: अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में चार दशक से भी पहले बना छोटे गोबरा ग्राम पंचायत का प्राथमिक शाला भवन अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। 21 दिसंबर 1981 को तत्कालीन कलेक्टर श्री नजीब हसन जंग उस समय के कलेक्टर द्वारा शिलान्यास किया गया यह भवन, 45 साल बाद भी एक पक्की छत के लिए तरस रहा है। बार-बार की मरम्मत से थक चुकी खपरैल की छत और जर्जर दीवारें हर वक्त किसी बड़े हादसे को न्योता दे रही हैं।
बारिश में दलदल बन जाते हैं कमरे, बैठने की व्यवस्था नहीं
बारिश का मौसम आते ही छत से पानी टपकने लगता है। विद्यालय में बुनियादी सुविधाओं का इस कदर अभाव है कि बच्चों के बैठने के लिए सही कुर्सी-टेबल तक नहीं हैं; जो उपलब्ध हैं, वे भी टूट चुके हैं। इसी वर्ष प्राथमिक और माध्यमिक शाला के मर्ज होने तथा शाला समिति के पास फंड न आने के कारण सुधार कार्य एक बड़ी चुनौती बन गया है। 55 मासूम बच्चे जान जोखिम में डालकर, सीलन भरे फर्श पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। भवन की एक दीवार पूरी तरह झुक चुकी है, जिसके कभी भी धराशायी होने का खतरा है। हर साल सिर्फ खपरैल बदलकर लीपापोती कर दी जाती है।
लाल आतंक से मुक्ति, लेकिन विकास से महरूम
यह इलाका पिछले चार दशकों तक नक्सलवाद के खौफ और लाल आतंक के साए में रहा। क्षेत्र अब नक्सल मुक्त हो चुका है, लेकिन प्रशासन की बेरुखी के चलते बुनियादी विकास की राह ताक रहा है। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि आतंक के खात्मे के बाद शिक्षा और अधोसंरचना की नई बयार बहेगी, लेकिन इस 45 साल पुराने जर्जर स्कूल ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल कर रख दी है।
‘स्कूल जतन योजना’ का काम 4 साल से अधूरा
पुराने भवन की खस्ताहाल स्थिति को देखते हुए शासन की ‘स्कूल जतन योजना’ के तहत नए भवन के निर्माण को स्वीकृति मिली थी। इससे बच्चों में पक्की छत की उम्मीद जगी थी, लेकिन 4 साल बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है। कछुआ गति से चल रहे काम के कारण नौनिहालों को उसी जर्जर भवन में बैठना पड़ रहा है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी?
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) गरियाबंद, राजेश चंद्राकर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा:
“नए शाला भवन की स्वीकृति और पुराने जर्जर भवन के सुधार के लिए हम अपने स्तर से लगातार शासन को पत्राचार करते हैं। प्रशासकीय स्वीकृति आने के बाद ही निर्माण कार्य संबंधित एजेंसी या ठेकेदारों को सौंपा जाता है। छोटे गोबरा पूर्व में नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा है, जिसके कारण भी विगत वर्षों में भवनों का सुधार प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद, हम हर संभव प्रयास कर रहे हैं। अधूरे पड़े भवन के समाधान के लिए हमने ‘समग्र शिक्षा विभाग’ को भी पत्र लिखा है, ताकि बच्चों को जल्द सुरक्षित व पक्का भवन मिल सके।”

