मैनपुर (गरियाबंद)। गरियाबंद जिले के ग्राम पंचायत मैनपुरकला में लोक निर्माण विभाग (पुल-पुलिया निर्माण विभाग) द्वारा निर्मित नव-निर्मित पुल निर्माण के कुछ ही महीनों बाद विवादों में घिर गया है। ग्रामीणों और किसानों का आरोप है कि लगभग छह महीने पहले बने इस पुल में अब दरारें दिखाई देने लगी हैं। साथ ही निर्माण की गुणवत्ता, किसानों की जमीन, अधूरे सुरक्षा कार्य और जल निकासी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पुल का अभी तक विधिवत लोकार्पण नहीं हुआ है और निर्माण कार्य से संबंधित जानकारी भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं की गई है।
छह महीने में ही दिखने लगीं दरारें
पुल की सतह, किनारों और संरचना के कई हिस्सों में दरारें दिखाई देने लगी हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि समय रहते तकनीकी जांच नहीं कराई गई तो भविष्य में यह पुल सुरक्षा की दृष्टि से खतरा बन सकता है।
लोगों का कहना है कि किसी भी पुल का निर्माण वर्षों तक उपयोग को ध्यान में रखकर किया जाता है, ऐसे में कुछ ही महीनों में दरारें दिखाई देना निर्माण गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
घटिया निर्माण सामग्री उपयोग करने का आरोप
निर्माण कार्य के दौरान नदी से निकाली गई गंदी और गुणवत्ता-विहीन रेत का उपयोग किया गया। उनका आरोप है कि निर्माण सामग्री के चयन और गुणवत्ता परीक्षण में लापरवाही बरती गई, जिसका असर अब पुल की संरचना पर दिखाई देने लगा है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन ग्रामीण तकनीकी जांच की मांग कर रहे हैं।
किसानों पर दोहरी मार
स्थानीय किसानों का आरोप है कि पुल निर्माण के दौरान नदी के प्राकृतिक बहाव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनका कहना है कि पुल और उससे जुड़े सुरक्षा ढांचे का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि बारिश के दौरान पानी का दबाव खेतों की ओर बढ़ रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार पुल के पास बनने वाली डायवर्जन अथवा बाउंड्री वॉल का निर्माण भी अधूरा छोड़ दिया गया है। इससे नदी का पानी सीधे कृषि भूमि की ओर मुड़ रहा है और कटाव का खतरा बढ़ गया है।
किसानों का कहना है कि हर बारिश में उनकी फसलों और जमीन को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है।
डेढ़ एकड़ जमीन गई, मुआवजा अब तक नहीं
प्रभावित किसानों का आरोप है कि पुल निर्माण के लिए उनकी लगभग 1.5 एकड़ निजी कृषि भूमि का उपयोग किया गया, लेकिन आज तक उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिला है।
किसानों का कहना है कि जमीन जाने के बाद उनकी खेती प्रभावित हुई है, जबकि मुआवजा प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। इससे उनमें भारी नाराजगी है।
सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण स्थल पर परियोजना की लागत, निर्माण एजेंसी, कार्य अवधि और तकनीकी स्वीकृति से संबंधित कोई विभागीय सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ऐसी जानकारी का सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना आवश्यक है।
सुरक्षा इंतजामों का अभाव
पुल के दोनों ओर सड़क में तीखे मोड़ हैं, लेकिन वहां न तो रेडियम रिफ्लेक्टर लगाए गए हैं और न ही सुरक्षा बैरियर स्थापित किए गए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि रात के समय यह मार्ग दुर्घटनाओं को न्योता दे सकता है। उन्होंने तत्काल सुरक्षा उपाय किए जाने की मांग की है।
पुराना डायवर्सन बना नई समस्या
पुल निर्माण के दौरान आवागमन के लिए बनाए गए अस्थायी मार्ग की मिट्टी आज भी नदी के बहाव क्षेत्र में पड़ी हुई है।
किसानों का आरोप है कि बारिश के दौरान यही मिट्टी पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करती है, जिससे नदी का दबाव खेतों की ओर बढ़ जाता है और कटाव की समस्या पैदा होती है।
लंबे संघर्ष के बाद मिली थी पुल की स्वीकृति
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस पुल की मांग वर्षों पुरानी थी। बरसात के दिनों में आवागमन की गंभीर समस्या को देखते हुए ग्रामीणों ने कई बार धरना-प्रदर्शन किया, सड़क जाम किया और प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।
ग्रामीणों के अनुसार लंबे संघर्ष और जनदबाव के बाद पुल निर्माण की स्वीकृति मिली थी। ऐसे में निर्माण के कुछ ही महीनों बाद सामने आ रही समस्याओं ने लोगों को निराश कर दिया है।
एक ग्रामीण ने कहा,
जिस पुल के लिए गांव के लोगों ने वर्षों तक संघर्ष किया, आंदोलन किए और सड़क जाम तक किया, उसी पुल में छह महीने के भीतर दरारें दिखाई देना बेहद चिंताजनक है।
जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण कार्य में कथित अनियमितताओं की शिकायत कई बार संबंधित विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाई जा चुकी है, लेकिन अब तक किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि निर्माण कार्य पूरी गुणवत्ता के साथ हुआ है तो इतनी जल्दी दरारें क्यों दिखाई दे रही हैं। वहीं यदि शिकायतें सही हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
ग्रामीणों ने लोक निर्माण विभाग, जिला प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञों की संयुक्त टीम से पूरे निर्माण कार्य की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों और किसानों ने मांग की है कि—
- पुल की गुणवत्ता की तकनीकी जांच कराई जाए।
- निर्माण सामग्री की जांच की जाए।
- अधूरी बाउंड्री वॉल और सुरक्षा कार्य जल्द पूरे किए जाएं।
- प्रभावित किसानों को भूमि का उचित मुआवजा दिया जाए।
- नदी के बहाव क्षेत्र में पड़ी मिट्टी को हटाया जाए।
- जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसी की जवाबदेही तय की जाए।
मैनपुरकला का यह पुल क्षेत्र के लोगों के लिए विकास और सुविधा का प्रतीक बनने वाला था, लेकिन निर्माण के कुछ ही महीनों बाद सामने आई दरारें, किसानों की शिकायतें, अधूरे सुरक्षा कार्य और मुआवजे का लंबित मामला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
आने वाले मानसून को देखते हुए ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और लोक निर्माण विभाग पर टिकी हैं कि वे इन शिकायतों की जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने कब लाते हैं।




