रायपुर। क्या छत्तीसगढ़ के नगर सैनिकों को अपना हक पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी काफी नहीं है? क्या “समान कार्य के लिए समान वेतन” का सिद्धांत सिर्फ अदालतों तक सीमित रह जाएगा? आखिर जब सर्वोच्च न्यायालय राज्य सरकार की याचिका खारिज कर चुका है, तब भी हजारों नगर सैनिक अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए इंतजार क्यों कर रहे हैं? यही सवाल अब प्रदेशभर के नगर सैनिक उठा रहे हैं।
वर्षों से कानून-व्यवस्था बनाए रखने, चुनाव ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और अन्य सरकारी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नगर सैनिकों का कहना है कि उनसे पुलिसकर्मियों की तरह जिम्मेदारियां तो ली जाती हैं, लेकिन सुविधाओं और वेतन के मामले में उन्हें आज भी बराबरी का दर्जा नहीं मिला है।
2022 में शुरू हुई थी समान वेतन की लड़ाई

नगर सैनिकों की यह लड़ाई नई नहीं है। वर्ष 2022 में बिलासपुर जिले में कार्यरत होमगार्ड जवानों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए “समान कार्य के लिए समान वेतन” की मांग उठाई थी। उनका तर्क था कि जब वे पुलिस विभाग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ड्यूटी करते हैं, तो फिर वेतन और सुविधाओं में इतना बड़ा अंतर क्यों?
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां नगर सैनिकों को बड़ी राहत मिली। नगर सैनिकों का दावा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय देते हुए राज्य सरकार को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद प्रदेश के लगभग 10 हजार नगर सैनिकों में नई उम्मीद जगी थी कि अब वर्षों से लंबित मांगें पूरी होंगी।
राज्य सरकार की SLP भी हुई खारिज, फिर देरी क्यों?
मामले में राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी खारिज हो चुकी है। नगर सैनिकों का कहना है कि न्यायालय ने आदेश के पालन के लिए समय सीमा भी तय की थी, लेकिन निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और न्यायालय अपना फैसला सुना चुका है, तो फिर आदेश के क्रियान्वयन में देरी किस वजह से हो रही है? क्या फाइलें अब भी विभागों के बीच घूम रही हैं या फिर कोई और कारण है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा?
गृह विभाग को थी आदेश की जानकारी
जानकारी के अनुसार गृह विभाग ने मार्च 2026 में जारी पत्राचार में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए आवश्यक कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि शासन को न्यायालय के निर्णय की जानकारी थी और उस दिशा में प्रारंभिक कदम भी उठाए गए थे।
फिर सवाल उठता है कि जब विभाग को आदेश की जानकारी थी, तो अब तक अंतिम निर्णय या अधिसूचना क्यों जारी नहीं हुई? क्या नगर सैनिकों को सिर्फ आश्वासन देकर समय बिताया जा रहा है?
दिल्ली में बढ़ा भत्ता, छत्तीसगढ़ में इंतजार
हाल ही में सामने आए एक आधिकारिक आदेश में दिल्ली होमगार्ड्स के महंगाई भत्ते (DA) को 55 प्रतिशत से बढ़ाकर 58 प्रतिशत किए जाने की जानकारी सामने आई है। दस्तावेज़ के अनुसार होमगार्ड जवानों के दैनिक भत्ते में भी वृद्धि की गई है।
ऐसे में छत्तीसगढ़ के नगर सैनिक पूछ रहे हैं कि जब अन्य राज्यों में होमगार्ड जवानों की सुविधाओं में लगातार सुधार किया जा रहा है, तो यहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी आदेश का इंतजार क्यों कराया जा रहा है?
जवाबदेही तय होगी या फिर अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे जवान?
नगर सैनिकों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन समय पर नहीं होता, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी? क्या संबंधित विभागों से जवाब मांगा जाएगा? क्या सरकार कोई स्पष्ट समयसीमा बताएगी? या फिर नगर सैनिकों को एक बार फिर अपने अधिकारों के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी?
प्रदेशभर के हजारों नगर सैनिकों की निगाहें अब शासन के अगले कदम पर टिकी हैं। उन्हें उम्मीद है कि वर्षों की सेवा, संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार उन्हें उनका अधिकार मिलेगा।
लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—
“जब सुप्रीम कोर्ट ने हक दे दिया, तो उसे लागू करने से आखिर कौन रोक रहा है?”





