मैनपुर। हाल के वर्षों में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) को लेकर कई तरह के दावे और आरोप सामने आए हैं। सोशल मीडिया, स्थानीय राजनीति और जनचर्चाओं में यह कहा जाता रहा है कि टाइगर रिजर्व के नाम पर आदिवासी समुदायों के अधिकार छीने जा रहे हैं और विकास कार्यों को रोका जा रहा है। हालांकि, हाल ही में जारी जागरूकता सामग्री और उपलब्ध आधिकारिक तथ्यों से एक अलग तस्वीर सामने आती है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व का महत्व
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी जिलों में स्थित है। इसका गठन उदंती और सीतानदी वन्यजीव अभयारण्यों को मिलाकर किया गया था। यह क्षेत्र बाघ, गौर, भालू, जंगली कुत्ते, हिरण, हाथी और अनेक दुर्लभ पक्षियों सहित समृद्ध जैव विविधता का घर माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह क्षेत्र केवल वन्यजीव संरक्षण के लिए ही नहीं, बल्कि मध्य भारत के महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारों में भी शामिल है। यहां की नदियां, वन और वन्यजीव स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा पर्यावरणीय संतुलन दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
आदिवासी अधिकारों पर क्या है वास्तविक स्थिति?
रिजर्व क्षेत्र में 42 ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार प्रदान किए जा चुके हैं। इन अधिकारों के अंतर्गत लगभग 59,615 हेक्टेयर क्षेत्र समुदायों को संरक्षण, प्रबंधन और आजीविका संवर्धन के लिए सौंपा गया है।
इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण प्रक्रिया में भागीदार बनाना है, न कि उनके अधिकारों को सीमित करना। सामुदायिक वन अधिकारों की अवधारणा भी इसी दिशा में कार्य करती है कि वन और वनवासियों के हित साथ-साथ आगे बढ़ें।
कानूनी स्थिति क्या कहती है?
टाइगर रिजर्व से जुड़े कई निर्णय देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्थाओं और संरक्षण कानूनों के आधार पर लिए जाते हैं।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के दिशा-निर्देशों के अनुसार टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्रों का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत में टाइगर रिजर्व मॉडल का उद्देश्य कोर क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और बफर क्षेत्र में समुदाय आधारित विकास के बीच संतुलन बनाना है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और न्यायालयों के विभिन्न आदेशों के तहत ऐसे क्षेत्रों में किसी भी गैर-वन गतिविधि के लिए निर्धारित कानूनी स्वीकृतियां आवश्यक होती हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने की दिशा में प्रयास
पोस्टर के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:
- हाथी ट्रैकिंग और अलर्ट सिस्टम

- एंटी-पोचिंग ऑपरेशन
- अवैध अतिक्रमण और कटाई की पहचान
- सौर पंप वितरण
- समय पर चेतावनी प्रणाली
वन विभाग और संरक्षण एजेंसियों का दावा है कि इन उपायों से वन्यजीवों के लिए अधिक सुरक्षित क्षेत्र तैयार हुए हैं और मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी आई है।
भ्रम बनाम तथ्य
भ्रम 1: आदिवासी अधिकार समाप्त किए जा रहे हैं
तथ्य: CFR अधिकारों के माध्यम से हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र का प्रबंधन ग्राम सभाओं को सौंपा गया है।
भ्रम 2: विकास कार्य पूरी तरह रोक दिए गए हैं
तथ्य: आवश्यक सार्वजनिक सुविधाएं कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार संचालित की जा सकती हैं, जबकि संवेदनशील कोर क्षेत्रों में प्रतिबंध लागू होते हैं।
भ्रम 3: वन विभाग गांव खाली कराना चाहता है
तथ्य: किसी भी पुनर्वास या संरक्षण संबंधी प्रक्रिया को कानूनी प्रावधानों और अधिकारों के अनुरूप लागू किया जाता है।
यह क्षेत्र इतना संवेदनशील क्यों है?
उदंती-सीतानदी क्षेत्र को महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र माना जाता है। यहां की नदियां, घने वन और विविध वन्यजीव प्रजातियां पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में योगदान देती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोर क्षेत्रों में अनियंत्रित हस्तक्षेप से बाघों, जंगली भैंसों, हाथियों और अन्य वन्यजीवों के आवास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
संरक्षण और विकास साथ-साथ
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व का मूल उद्देश्य केवल वन्यजीवों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना भी है।
वन संरक्षण, सामुदायिक अधिकार, आजीविका संवर्धन, सांस्कृतिक विरासत का सम्मान और पर्यावरणीय संतुलन—इन सभी को साथ लेकर चलना ही इस मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती और सफलता है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व को लेकर फैली कई चर्चाओं के बीच यह समझना आवश्यक है कि संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि कानून, समुदाय और प्रशासन मिलकर कार्य करें, तो वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों के अधिकार और आजीविका दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
वन बचेंगे तो जैव विविधता बचेगी, और जैव विविधता बचेगी तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।






