पेसा कानून व 5वीं अनुसूची के तहत 13 गांवों के अधिकारों की रक्षा की मांग, जंगलों में नई बसाहट पर ग्रामीणों की दो-टूक चेतावनी
मैनपुर। गरियाबंद जिले अंतर्गत मैनपुर विकासखंड में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की सुरक्षा को लेकर स्थानीय आदिवासी समाज लामबंद हो गया है। बिरसा मुंडा अधिकार मंच के नेतृत्व में ग्रामीणों ने उप वनमंडलाधिकारी (SDO) वन विभाग मैनपुर को ज्ञापन सौंपकर अपने संरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी बाहरी ग्राम सभा के अनधिकृत हस्तक्षेप और संभावित अतिक्रमण पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
5वीं अनुसूची और पेसा कानून के तहत निहित हैं अधिकार
मंच द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि यह संपूर्ण क्षेत्र संविधान की 5वीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून के दायरे में आता है, जहां ग्राम सभाओं को स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। क्षेत्र की तीन ग्राम पंचायतों—गोपालपुर, देहरगुड़ा और दबनई के कुल 13 गांवों को वन अधिकार कानून की धारा 3(1)(झ) के तहत सामुदायिक वन संसाधन का अधिकार पत्र (पट्टा) विधिवत मिल चुका है। स्थानीय ग्राम सभाओं ने जंगल के संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन के लिए पहले से ही नियम-नीतियां तय की हैं, ऐसे में बाहरी हस्तक्षेप उनके अधिकारों का सीधा हनन है।
आदिवासी आस्था और देवस्थलों पर संकट
ज्ञापन में यह भी रेखांकित किया गया है कि यह विवाद मात्र भूमि सीमा का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ा है। इन पारंपरिक वन सीमाओं के भीतर ग्रामीणों के पूर्वजों द्वारा स्थापित पवित्र देवी-देवताओं के स्थल स्थित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी बाहरी बसाहट या अतिक्रमण से उनके देवस्थलों की पवित्रता भंग होगी और सांस्कृतिक पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
बिरसा मुंडा अधिकार मंच और स्थानीय ग्रामीणों ने दो-टूक शब्दों में चेताया है कि वे अपनी पारंपरिक सीमाओं में किसी भी प्रकार की बाहरी बसाहट बर्दाश्त नहीं करेंगे और अधिकारों की रक्षा के लिए चरणबद्ध कदम उठाएंगे।

