रायपुर | जब भी कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है, तो सबसे पहले ‘108 एंबुलेंस’ की सायरन की गूंज ही लोगों को राहत देती है। पूरे भारत देश में दिन-रात मरीजों की जान बचाने वाले ये 108 एंबुलेंस कर्मचारी (पायलट और ईएमटी) आज खुद गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। दूसरों की जान बचाने वाले इन कर्मचारियों को ऐसा महसूस होने लगा है जैसे वे कोई पुनीत सेवा नहीं, बल्कि एक श्राप झेल रहे हों।
छत्तीसगढ़ सहित देशभर में 108 कर्मचारियों के भीतर भारी आक्रोश पनप रहा है। महीनों से रुका हुआ मात्र 10,000 रुपये का वेतन, भूखे-प्यासे 12-12 घंटे की ड्यूटी और हर कदम पर मिलने वाले मानसिक तनाव ने इनके सब्र का बांध तोड़ दिया है।

जेब से खर्च, और 10 हजार की सैलरी भी रुकी कर्मचारियों का दर्द बयां करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है। मात्र 10,000 रुपये की मामूली सैलरी पर वे काम करते हैं और प्रबंधन ने उसे भी रोक रखा है।
जब किसी गंभीर मरीज को रेफर कर दूसरे बड़े अस्पताल या शहर छोड़ने जाना पड़ता है, तो रास्ते में खाने-पीने का 300 रुपये का खर्च कर्मचारियों को अपनी जेब से भरना पड़ता है।
इसके अलावा रोजाना की ड्यूटी और रनिंग में भी कम से कम 50 रुपये का अतिरिक्त खर्च उनकी जेब पर भारी पड़ता है। ऐसे में बिना वेतन के परिवार का भरण-पोषण करना नामुमकिन हो गया है।
12 घंटे की भूखी-प्यासी ड्यूटी और चौतरफा दबाव कर्मचारियों का कहना है कि पूर्व में JAES (कंपनी) के तहत 12-12 घंटे की ड्यूटी कराई जाती थी, जिसमें उन्हें ना ठीक से खाने का वक्त मिलता था और ना ही पानी पीने का।
ट्रैफिक या किसी अन्य वजह से अगर एंबुलेंस पहुंचने में थोड़ी भी लेट हो जाए, तो प्रबंधन (EME) की फटकार सुननी पड़ती है।
वहीं दूसरी तरफ, मरीज के अटेंडर (परिजनों) का गुस्सा और गालियां भी इन कर्मचारियों को ही झेलनी पड़ती हैं।
“हम सेवा करते हैं, लेकिन वैल्यू शून्य “ कर्मचारियों का मानसिक तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि वे खुद को बेहद अपमानित महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है, “कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम इतना महान सेवा का काम करते हैं, लेकिन समाज और सिस्टम में हमारी वैल्यू एक कुत्ते जैसी रह गई है।” ऊपर से मीडिया का दबाव अलग है। अगर ड्यूटी के दौरान कोई छोटी सी भी मानवीय भूल हो जाए, तो मीडिया बिना बुलाए पहुंच जाती है और उन्हें खलनायक की तरह पेश किया जाता है, जबकि उनकी जमीनी समस्याओं पर कोई बात नहीं करता।
नेताओं से अपील और उग्र आंदोलन की चेतावनी अब 108 कर्मचारियों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी मांग है कि इस वक्त पूरे देश में, और विशेषकर छत्तीसगढ़ के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को उनके समर्थन में आगे आना चाहिए।
कर्मचारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि, “10 हजार की सैलरी रुकने से बड़ा दर्द कोई नहीं समझ सकता। जिस तरह से हमारे ऊपर मेंटल प्रेशर (मानसिक दबाव) बढ़ाया जा रहा है, अगर हालात नहीं सुधरे तो हम जल्द ही उग्र आंदोलन करने को मजबूर हो जाएंगे।”
अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग समय रहते इन कोरोना योद्धाओं और जीवन रक्षकों की गुहार सुनता है, या स्वास्थ्य व्यवस्था को किसी बड़े ब्रेकडाउन का सामना करना पड़ेगा।





