रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सीमांत क्षेत्र में स्थित नकटी (सम्मानपुर) गांव 29 जून 2026 के बाद से राज्य की राजनीति और प्रशासनिक विमर्श का केंद्र बन गया है। राज्य सरकार के प्रस्तावित ‘विधायक कॉलोनी’ (Legislator’s Housing Colony) के निर्माण के लिए प्रशासन ने गांव के लगभग 80 से अधिक मकानों को जमींदोज कर दिया। इस कार्रवाई ने न केवल 15 हेक्टेयर (लगभग 56 एकड़) भूमि को ‘अतिक्रमण मुक्त’ कराने के सरकारी दावों पर बहस छेड़ दी है, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और सत्ता के ‘एलीट कैप्चर’ (Elite Capture) पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
भौगोलिक महत्ता: क्यों चुना गया नकटी गांव?
नकटी गांव कोई सामान्य ग्रामीण क्षेत्र नहीं है। धरसींवा विकासखंड के अंतर्गत आने वाला यह गांव स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डे से मात्र 2-5 किलोमीटर की दूरी पर है और नया रायपुर (नवा रायपुर) के प्रशासनिक केंद्र के बेहद करीब है।
नगरीय समाजशास्त्र के जानकारों के अनुसार, जब भी कोई क्षेत्र सत्ता के केंद्र के करीब आता है, तो वहां की बेशकीमती जमीनों पर संभ्रांत और शक्तिशाली वर्गों का नियंत्रण स्थापित होने लगता है। मार्च 2025 के विधानसभा बजट सत्र में ही विधायकों और सांसदों के आवास के लिए जमीन तलाशने की बात उठी थी। इस लिहाज से 29 जून की कार्रवाई कोई आकस्मिक कदम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रशासनिक रणनीति का हिस्सा नजर आती है।
एक नजर में विवादित क्षेत्र के तथ्य:
| विवरण | तथ्य |
| गांव का नाम | नकटी (वैकल्पिक नाम: सम्मानपुर) |
| विकासखंड और जिला | धरसींवा, जिला रायपुर |
| विवादित भूमि का क्षेत्रफल | 15.4790 हेक्टेयर (लगभग 56 एकड़) |
| खसरा नंबर | 460 |
| प्रशासनिक कार्रवाई का दिन | 29 जून 2026 (सोमवार) |
वैधानिक कानून बनाम पारंपरिक अधिकार का टकराव
रायपुर जिला प्रशासन और राजस्व विभाग का स्पष्ट तर्क है कि खसरा नंबर 460 की यह भूमि राज्य सरकार की संपत्ति है और यहां निवासरत परिवार ‘अवैध अतिक्रमणकारी’ थे। 11 अप्रैल 2025 को तहसीलदार न्यायालय ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 248 के तहत बेदखली का आदेश भी पारित किया था।
वहीं, दूसरी ओर ग्राम पंचायत के सरपंच और वरिष्ठ ग्रामीणों का दावा है कि राजस्व अभिलेखों में यह भूमि ‘शामिलात चरागाह’ के रूप में दर्ज थी, जिसे पीढ़ियों पहले उनके पूर्वजों ने दान किया था। आबादी बढ़ने पर ग्राम सभा ने इसे भूमिहीनों में बांटा, जहां पिछले 3-4 दशकों से 85 परिवार बसे हुए थे। ग्रामीण खुद को अतिक्रमणकारी नहीं, बल्कि पैतृक भूमि का हिस्सेदार मानते हैं।
सरकारी योजनाओं का विरोधाभास: घर बनाने के लिए पैसे दिए, फिर बुलडोजर से तोड़े
इस पूरी त्रासदी का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी है।
कर्ज के जाल में फंसे ग्रामीण: ध्वस्त किए गए 80 मकानों में से लगभग 30-32 मकान ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ (PMAY) और ‘इंदिरा आवास योजना’ के तहत बने थे। बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन सरकारी थी, तो पंचायत विभाग ने पक्के मकानों के लिए सरकारी धन कैसे स्वीकृत किया?
ग्रामीणों ने सरकारी किश्त (₹1,20,000) नाकाफी होने पर खेत बेचे और 2 से 3 लाख रुपये तक का कर्ज लेकर घर पूरे किए थे। अब घर मलबे में तब्दील हो चुके हैं और ये परिवार भारी कर्ज में डूब गए हैं।
इसी बस्ती में सरकार ने ‘जल जीवन मिशन’ के तहत पानी की टंकियां और घर-घर नल कनेक्शन दिए थे। पक्की बिजली लाइनें बिछाई गई थीं और लोगों के पास वैध वोटर आईडी और राशन कार्ड भी मौजूद थे।
29 जून की खौफनाक सुबह: पुलिस छावनी में तब्दील हुआ गांव
मानसून की शुरुआत से ठीक पहले प्रशासन ने भारी लाव-लश्कर के साथ गांव में प्रवेश किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लगभग 1,000 से 4,000 तक सुरक्षा बल तैनात किए गए और 15 बुलडोजरों ने कुछ ही घंटों में दशकों पुरानी बस्ती को ईंटों के ढेर में बदल दिया। कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय का आरोप है कि आधी रात को बिजली काटकर प्रशासन ने दहशत का माहौल बनाया, जिससे बच्चे और महिलाएं भूखे-प्यासे अपने उजड़ते घरों को देखने को विवश हो गए।
विफलता की ओर पुनर्वास नीति
प्रशासन का दावा है कि प्रभावितों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 स्थित ईडब्ल्यूएस (EWS) कॉलोनियों में 1BHK फ्लैट (लगभग 538 वर्ग फीट) आवंटित किए जा रहे हैं। लेकिन, 12 से 25 सदस्यों वाले बड़े संयुक्त ग्रामीण परिवारों के लिए एक छोटे से फ्लैट में रहना अव्यावहारिक है। इसके अलावा, ग्रामीणों का आरोप है कि नए फ्लैटों में बिजली, खिड़कियां और बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। सबसे बड़ी बात, कृषि और पशुपालन से जुड़े इन ग्रामीणों को शहरी ईडब्ल्यूएस कॉलोनी में धकेलने से उनकी आजीविका पूरी तरह छिन गई है।
गरमाई सियासत: कांग्रेस का आक्रामक रुख
इस ध्वस्तीकरण ने राज्य में एक बड़े राजनीतिक तूफान को जन्म दे दिया है:
विधायक जनकराम ध्रुव की मांग: बिन्द्रानवागढ़ के कांग्रेस विधायक जनकराम ध्रुव ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र लिखकर मांग की है कि विधायक कॉलोनी को नकटी से हटाकर नवा रायपुर में बनाया जाए। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि गरीबों का आशियाना उजाड़ कर बने घरों में रहना उचित नहीं है।

भूपेश बघेल का हमला: पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने स्थानीय भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल के उस आश्वासन की याद दिलाई जिसमें बारिश में मकान न तोड़ने का वादा किया गया था। उन्होंने इसे प्रशासन और स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय की कमी और आंतरिक गुटबाजी करार दिया।

दीपक बैज और टी.एस. सिंह देव: पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज ने पूछा कि जब नया रायपुर में 1 रुपये प्रति वर्ग फीट पर जमीन उपलब्ध है, तो 40 साल पुरानी बस्ती क्यों उजाड़ी गई? वहीं, टी.एस. सिंह देव ने बारिश से ठीक पहले की गई कार्रवाई को सरकार की संवेदनहीनता बताया।

दूसरी तरफ, भाजपा नेता और कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सरकार नियमों के तहत काम कर रही है और प्रभावितों का विधिवत पुनर्वास किया जा रहा है।
विकास या हाशिएकरण?
नकटी गांव की घटना मात्र भूमि विवाद नहीं है, बल्कि यह विकास के उस ‘बहिष्करणीय मॉडल’ (Exclusionary Model) को दर्शाती है जहां शहरीकरण का लाभ केवल रसूखदारों को मिलता है और गरीबों को परिधि पर धकेल दिया जाता है। विधायक जनकराम ध्रुव का प्रस्ताव एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। नवा रायपुर, जो पहले से ही प्रशासनिक कार्यों के लिए विकसित है, वहां विधायकों को बसाने से न केवल विस्थापन रुकेगा, बल्कि सरकार भी राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश से बच सकेगी। राज्य सरकार को इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, ताकि विकास की अंधी दौड़ में मानवीय संवेदनाएं मलबे के नीचे न दब जाएं।










