मैनपुर के कई गांवों में 1 से 3 महीने तक पोषण आहार नहीं पहुंचने का आरोप; बड़े गोबरा में एक केंद्र पर ही 3-5 कुपोषित बच्चों की जानकारी, पूरे ब्लॉक में करीब 1120 बच्चे कुपोषित होने का दावा
मैनपुर। छत्तीसगढ़ को कुपोषण से मुक्त करने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं तक पोषण आहार पहुंचाने की व्यवस्था है। बच्चों के वजन और लंबाई की निगरानी के लिए पोषण ट्रैकर तक लागू है, जिसे केंद्र सरकार अंतिम छोर तक पोषण सेवाओं की निगरानी का डिजिटल माध्यम बताती है।
लेकिन मैनपुर के आदिवासी अंचल से सामने आ रही तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है।
ग्रामीणों और आंगनबाड़ी केंद्रों में काम करने वाली कार्यकर्ताओं से स्थानीय स्तर पर की गई पड़ताल में आरोप सामने आए हैं कि कई गांवों में बच्चों को मिलने वाला पोषण आहार समय पर नहीं पहुंच रहा है। कहीं एक महीने तो कहीं दो से तीन महीने तक पोषण आहार नहीं मिलने की बात कही जा रही है।
सवाल यह है कि जब बच्चा हर दिन पोषण का हकदार है, तो उसके हिस्से का पोषण आहार महीनों तक क्यों अटक रहा है?
बड़े गोबरा से खुली व्यवस्था की पोल?

मुकेश कुमार 14 वर्ष
मैनपुर विकासखंड के बड़े गोबरा में स्थानीय पड़ताल के दौरान एक आंगनबाड़ी केंद्र से ही करीब 3 से 5 बच्चों के कुपोषित होने की जानकारी सामने आने का दावा किया गया। इनमें कुमेश्वरी कमार उम्र करीब 3 वर्ष , सृष्टि यादव उम्र करीब 1.5 वर्ष और मुकेश उम्र करीब 14 वर्ष के नाम बताए गए हैं।

यह सिर्फ एक केंद्र की तस्वीर है। स्थानीय स्तर पर मैनपुर विकासखंड में करीब 1120 बच्चों के कुपोषित होने की जानकारी सामने आने का दावा किया जा रहा है।
यदि यह आंकड़ा विभागीय रिकॉर्ड से पुष्ट होता है तो सवाल और गंभीर हो जाता है—जिस ब्लॉक में इतनी बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषित दर्ज हैं, वहां पोषण आहार की आपूर्ति में महीनों की देरी कैसे हो रही है?
बच्चों के कुपोषण की श्रेणी निर्धारित करने के लिए विभागीय मापदंड और अधिकृत रिकॉर्ड अंतिम आधार होंगे। इसलिए 1120 की संख्या की आधिकारिक पुष्टि भी जरूरी है।

बड़े गोबरा से छोटे गोबरा तक…कहानी एक जैसी?
स्थानीय पड़ताल में बड़े गोबरा, छोटे गोबरा, कोचेंगा , खरता, बरगांव (कोकड़ी), चिपरी, खोलापारा, महुआनाला, भाटापानी कमारपारा और कोकड़ी सहित कई गांवों में पोषण आहार की नियमित आपूर्ति को लेकर शिकायतें सामने आने का दावा किया गया है।
कई ग्रामीणों का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों के लिए मिलने वाला पोषण आहार नियमित नहीं पहुंचता। कुछ जगहों पर लंबे अंतराल तक आपूर्ति नहीं होने की बात कही गई।
मैनपुर क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग हैं। बड़ी संख्या में गांव दूरस्थ और वनांचल क्षेत्र में हैं। यहां कमार, भुंजिया समेत आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्गों के परिवार बड़ी संख्या में निवास करते हैं।
ऐसे इलाकों में आंगनबाड़ी केंद्र सिर्फ एक सरकारी भवन नहीं, बल्कि बच्चों के पोषण और शुरुआती स्वास्थ्य सेवाओं की अहम कड़ी हैं।
सरकारी रिकॉर्ड में सेवा…जमीन पर सवाल
इस पूरी पड़ताल का सबसे बड़ा सवाल पोषण ट्रैकर को लेकर है।![]()
स्थानीय स्तर पर आरोप है कि कुछ ऐसे बच्चों के नाम भी पोषण संबंधी रिकॉर्ड में दर्ज हैं, जिन्हें वास्तविक रूप से पोषण आहार मिलने की बात ग्रामीण और कार्यकर्ता नहीं बताते।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला सिर्फ पोषण आहार नहीं पहुंचने तक सीमित नहीं रहेगा।
सवाल उठेगा कि—
क्या आंगनबाड़ी में पोषण आहार पहुंचा?
कितना पहुंचा?
किस तारीख को पहुंचा?
किस बच्चे को दिया गया?
और फिर पोषण ट्रैकर में क्या दर्ज किया गया?
केंद्र सरकार के अनुसार Poshan Tracker बच्चों में stunting, wasting और underweight जैसे पोषण संकेतकों की निगरानी के साथ पोषण सेवाओं की अंतिम छोर तक डिलीवरी को ट्रैक करने के लिए इस्तेमाल होता है।
विभाग से पूछा तो जिम्मेदारी दूसरे विभाग की?
जब पोषण आहार की आपूर्ति को लेकर जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी वरुण नागेश से सवाल किया गया तो उनका कहना है कि उनके पास इस तरह की कोई शिकायत नहीं आई है। उन्होंने पोषण आहार की आपूर्ति की जिम्मेदारी संबंधित बीज विभाग की होने की बात कही।
यानी सवाल यह है कि यदि आंगनबाड़ी केंद्र में पोषण आहार नहीं पहुंच रहा है तो शिकायत किसके पास पहुंचेगी और निगरानी कौन करेगा?
बीज विभाग ने कहा- हमें जानकारी नहीं मिली
वहीं अभिषेक सिंह, बीज विभाग ने कहा कि सुपरवाइजर और पोषण ट्रैकर से प्रतिमाह मिलने वाली जानकारी के अनुसार उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसी स्थिति बताई जा रही है तो वे इस संबंध में पता करेंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि नदी-नालों से प्रभावित गांवों में कई बार पोषण आहार नजदीकी आंगनबाड़ी केंद्रों में छोड़ दिया जाता है, ताकि वहां से संबंधित गांवों के हितग्राहियों तक पहुंचाया जा सके।
लेकिन यहां भी सवाल वही है—यदि पोषण आहार दूसरे केंद्र में छोड़ा जाता है तो क्या संबंधित बच्चों और महिलाओं तक वास्तव में वह पहुंच रहा है?
सरकार के आंकड़े कहते हैं कुपोषण घटा, मैनपुर की तस्वीर क्या कहती है?
राज्य सरकार के प्रकाशित आंकड़ों में पिछले वर्षों में कुपोषण में बड़ी कमी का दावा किया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार के नवंबर 2025 के प्रकाशन में राज्य की कुपोषण दर 2000 के 60.8% से घटकर 2025 में 14.67% बताई गई है।
वहीं 2026-27 के चाइल्ड बजट में कुपोषण मुक्ति अभियान के तहत करीब 2.50 लाख कुपोषित बच्चों के लिए आवश्यकता का उल्लेख है।
इससे तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आता है—राज्य स्तर पर आंकड़े घट रहे हैं, लेकिन कुपोषण अभी खत्म नहीं हुआ है।
ऐसे में मैनपुर जैसे दूरस्थ आदिवासी ब्लॉक में पोषण आहार की आपूर्ति की वास्तविक स्थिति जांचना और भी जरूरी हो जाता है।
अब इन 7 सवालों के जवाब जरूरी
1. मैनपुर की कितनी आंगनबाड़ियों में पिछले 6 महीने में पोषण आहार देर से पहुंचा?
2. किन केंद्रों में एक या दो महीने तक सप्लाई बाधित रही?
3. करीब 1120 बताए जा रहे कुपोषित बच्चों का आधिकारिक आंकड़ा क्या है?
4. इनमें कितने SAM और MAM श्रेणी में हैं?
5. पिछले 6 महीने में मैनपुर के लिए कितना पोषण आहार भेजा गया और कितना वितरित हुआ?
6. पोषण ट्रैकर में दर्ज बच्चों की संख्या और वास्तविक वितरण रजिस्टर में कितनी समानता है?
7. यदि किसी केंद्र में महीनों तक पोषण आहार नहीं पहुंचा तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय की गई?
सवाल बच्चों के भविष्य का है
कुपोषण सिर्फ आंकड़ा नहीं है। बच्चे के शरीर और विकास के शुरुआती वर्षों में मिलने वाला पर्याप्त पोषण उसके स्वास्थ्य और विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
इसलिए मैनपुर की इस पड़ताल का असली सवाल यह नहीं है कि सरकारी रिकॉर्ड में कुपोषण कितना कम हुआ।
असली सवाल यह है—
क्या मैनपुर के दूरस्थ गांवों में रहने वाले बच्चे तक उसका पोषण आहार समय पर पहुंच रहा है?
अगर जवाब हां है तो विभाग को गांववार वितरण रिकॉर्ड सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
और अगर जवाब नहीं है तो फिर सवाल सिर्फ पोषण आहार का नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकार और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का है।
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