23.34 करोड़ की लागत से 5 पैकेज में बननी है सड़क, डामरीकरण से पहले अटका काम; टाइगर रिजर्व की अनुमति बनी बड़ी बाधा
मैनपुर। आजादी के दशकों बाद पक्की सड़क की उम्मीद जगी तो गरियाबंद जिले के अति संवेदनशील वनांचल आमामोरा-ओड़ के ग्रामीणों को लगा था कि अब उनकी वर्षों पुरानी परेशानी खत्म होगी। लेकिन सड़क निर्माण पर वन एवं वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी अनुमति की अड़चन ने एक बार फिर ग्रामीणों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है और अब बारिश के चलते बनाए गए पुल-पुलिया व सड़क के एप्रोच मार्ग भी क्षतिग्रस्त होने लगे हैं।
धवलपुर एनएच-130सी से कुकुरार तक करीब 31.65 किलोमीटर सड़क का निर्माण आमामोरा और ओड़ जैसे दूरस्थ गांवों को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए किया जा रहा है। इस सड़क को दोबारा 23.34 करोड़ रुपए की लागत से पांच हिस्सों में स्वीकृत किया गया था। निर्माण कार्य आगे बढ़ने के बाद वन क्षेत्र से संबंधित अनुमति का मामला सामने आने पर काम रोकना पड़ा।
सड़क बनी, लेकिन डामरीकरण से पहले रुक गया काम
लगभग 10 किलोमीटर हिस्से में डामरीकरण सहित अन्य कार्य बाकी थे। शेष हिस्से में अर्थवर्क चल रहा था। इसी दौरान निर्माण कार्य रोक दिया गया।
अब अधूरी सड़क पर बारिश ग्रामीणों के लिए नई मुसीबत बन गई है। जगह-जगह बड़े गड्ढे हो गए हैं। बनाए गए कुछ पुल-पुलिया और उनके एप्रोच मार्गों की मिट्टी बारिश में बहने लगी है। ग्रामीणों को इसी क्षतिग्रस्त मार्ग से होकर रोजाना आवाजाही करनी पड़ रही है। ऐसे में दोपहिया वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा बना हुआ है।
पुल-पुलिया बह गए तो फिर कौन कराएगा निर्माण?
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क का निर्माण शुरू होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि अब अस्पताल, स्कूल, बाजार और मैनपुर मुख्यालय तक पहुंच आसान हो जाएगी। लेकिन काम रुकने से यह उम्मीद अधूरी दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बारिश में यदि अधूरे पुल-पुलिया और एप्रोच मार्ग पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए तो उनकी मरम्मत कौन कराएगा? क्या सड़क का काम दोबारा शुरू होने पर इन संरचनाओं का फिर से निर्माण किया जाएगा या पहले से खर्च हो चुकी राशि के बावजूद ग्रामीणों को फिर उसी पथरीले रास्ते का सहारा लेना पड़ेगा?
17 साल से सड़क का इंतजार
इस सड़क का इतिहास भी लंबा है। धवलपुर से कुकुरार तक 31.65 किमी सड़क की स्वीकृति वर्ष 2008 में मिली थी। उस समय इसकी लागत करीब 10 करोड़ रुपए थी। बाद में काम रुकने के बाद वर्ष 2022 में इसे बढ़ी हुई लागत 23.34 करोड़ रुपए पर दोबारा टेंडर किया गया और निर्माण को पांच हिस्सों में बांटा गया।

वन विभाग की अनुमति बनी सबसे बड़ी अड़चन
यह इलाका उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व से जुड़ा होने के कारण सड़क निर्माण के लिए वन एवं वन्यजीव संबंधी मंजूरियां जरूरी हैं। पूर्व में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार निर्माण क्षेत्र का करीब 10 हेक्टेयर हिस्सा अभयारण्य के बफर जोन में आता है और केंद्र स्तर से आवश्यक वन एवं वन्यजीव स्वीकृति की जरूरत बताई गई थी।
क्या कहते हैं DFO वरुण जैन
DFO वरुण जैन के अनुसार, “इस सड़क के लिए हमने अपनी ओर से शासन को प्रस्ताव भेजा हुआ है। राज्य सरकार से मंजूरी मिल चुकी है। अब केंद्र सरकार से मंजूरी मिलते ही सड़क का कार्य प्रारंभ हो जाएगा।”
ग्रामीणों की उम्मीद अब केंद्र की मंजूरी पर
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क उनके लिए सिर्फ विकास का काम नहीं, बल्कि इलाज, शिक्षा, राशन, बाजार और सरकारी सुविधाओं तक पहुंचने की जीवनरेखा है। वर्षों से पत्थरीले और दुर्गम रास्ते पर आवाजाही करने वाले ग्रामीणों को पक्की सड़क बनने की उम्मीद थी।
अब सवाल यही है कि 23.34 करोड़ रुपए की लागत से पांच पैकेज में स्वीकृत यह सड़क आखिर कब पूरी होगी? केंद्र की अनुमति कब मिलेगी और बारिश में क्षतिग्रस्त हो रहे पुल-पुलिया व एप्रोच मार्गों को बचाने के लिए तत्काल क्या कदम उठाए जाएंगे—इन सवालों का जवाब ग्रामीण बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।


