मैनपुर/गरियाबंद। ग्राम छैला के खसरा नंबर 298, रकबा 1.90 हेक्टेयर से जुड़ा एक मामला इन दिनों क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। उपलब्ध राजस्व अभिलेखों एवं दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1980 से उक्त भूमि पर अंकुर पिता दुकालू, जाति गोंड का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है। संबंधित भूमि की पुरानी ऋण पुस्तिका क्रमांक 048123 जारी थी, जो बाद में विलुप्त हो गई। इसके पश्चात वर्ष 2016 में तहसील कार्यालय द्वारा नई ऋण पुस्तिका क्रमांक 1867727 पुनः अंकुर पिता दुकालू के नाम से जारी की गई।


ऋण पुस्तिका में बदली तस्वीर, शुरू हुआ विवाद
मामले में सबसे बड़ा विवाद नई ऋण पुस्तिका में दर्ज तस्वीर को लेकर सामने आया है। आरोप है कि पुरानी ऋण पुस्तिका में अंकुर पिता दुकालू के परिवार की पहचान दर्ज थी, जबकि वर्ष 2016 में जारी नई ऋण पुस्तिका में कथित रूप से खरतराम पिता रायघर की तस्वीर दिखाई देने लगी। हैरत की बात यह बताई जा रही है कि वास्तविक भू-स्वामी अंकुर पिता दुकालू को इस बदलाव की जानकारी तक नहीं हो सकी।


स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों एवं अधिकारियों की मिलीभगत से अभिलेखों में परिवर्तन किया गया। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
नहर निर्माण और मुआवजा भुगतान पर खड़े हुए सवाल
विवाद तब और गहरा गया जब जल संसाधन विभाग द्वारा खसरा नंबर 298 की भूमि के लगभग 0.14 हेक्टेयर क्षेत्र में नहर नाली निर्माण कराया गया। इसके एवज में भू-अर्जन अधिकारी द्वारा 3 लाख 11 हजार 220 रुपये की मुआवजा राशि चेक क्रमांक 008357 दिनांक 20 जुलाई 2022 के माध्यम से जारी की गई।


दस्तावेजों के अनुसार यह मुआवजा राशि अंकुर पिता दुकालू के नाम से जारी हुई तथा भुगतान प्राप्ति के लिए अंगूठा निशान भी लिया गया। लेकिन आरोप है कि वास्तविक भू-स्वामी को राशि प्राप्त नहीं हुई और कथित रूप से खरतराम पिता रायघर को भुगतान कर दिया गया।
यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं तो मुआवजा वितरण प्रक्रिया और पहचान सत्यापन प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
आधार और पैन कार्ड में कथित पहचान परिवर्तन का आरोप
मामले में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। आरोप है कि वर्ष 2016 के बाद अंकुर पिता दुकालू के नाम से संबंधित अभिलेखों का उपयोग करते हुए खरतराम पिता रायघर के नाम पर आधार कार्ड क्रमांक 878740955784 तैयार कराया गया। बाद में इसी आधार संख्या से अंकुर पिता दुकालू का नाम भी जोड़े जाने का दावा किया जा रहा है।
इसके अलावा दो अलग-अलग पैन कार्ड क्रमांक ESVPA6354J एवं JAHPS6188F भी प्रकरण से जुड़े होने की बात सामने आई है। हालांकि संबंधित व्यक्तियों द्वारा मतदाता पहचान पत्र तैयार कराने में सफलता नहीं मिलने की जानकारी भी दस्तावेजों में बताई गई है।


जाति और पहचान को लेकर बड़ा विरोधाभास
पुराने मिसल एवं राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार खसरा नंबर 298 की भूमि पर दर्ज भू-स्वामी अंकुर पिता दुकालू की जाति गोंड दर्ज बताई गई है। वहीं दूसरी ओर, जब ऑनलाइन रिकॉर्ड सुधार के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया तो खरतराम पिता रायघर द्वारा स्वयं को रावत जाति का बताया गया।
ऐसे में एक ही भूमि और एक ही नाम से जुड़े अभिलेखों में अलग-अलग व्यक्तियों और जातियों का उल्लेख पूरे मामले को और जटिल बना रहा है।
मुआवजा 2022 में, पंचनामा 2026 में
दस्तावेजों के अनुसार जल संसाधन विभाग द्वारा 20 फरवरी 2026 को एक हस्तलिखित पंचनामा तैयार किया गया, जिसमें कथित रूप से खरतराम पिता रायघर को ही अंकुर पिता दुकालू बताया गया।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि भूमि स्वामी की पहचान को लेकर विवाद था तो पंचनामा मुआवजा वितरण के समय वर्ष 2022 में क्यों नहीं तैयार किया गया? चार वर्ष बाद तैयार किए गए पंचनामा ने मामले को और अधिक संदेहास्पद बना दिया है।


पटवारी जांच प्रतिवेदन पर भी उठे सवाल
पटवारी हल्का नंबर 03 चिखली द्वारा प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन में वर्ष 1980 से दर्ज अंकुर पिता दुकालू के नाम को अभिलेखीय त्रुटि बताया गया है तथा खाता धारक के रूप में खरतराम पिता रायघर का नाम सही बताया गया है।
हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों में दोनों व्यक्तियों के नाम, पिता का नाम, जाति एवं पहचान संबंधी जानकारी अलग-अलग होने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में जांच प्रतिवेदन की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: यदि नाम त्रुटिपूर्ण था तो मुआवजा किसे मिला?
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि राजस्व विभाग के अनुसार अंकुर पिता दुकालू का नाम अभिलेख में त्रुटिवश दर्ज था, तो वर्ष 2022 में भू-अर्जन अधिकारी द्वारा मुआवजा राशि अंकुर पिता दुकालू के नाम से क्यों जारी की गई?
यदि भुगतान वास्तविक भू-स्वामी को नहीं मिला तो अंगूठा निशान किसका लिया गया? पहचान किस आधार पर सत्यापित की गई? और आखिर किस व्यक्ति ने मुआवजा राशि प्राप्त की?


निष्पक्ष जांच की मांग
अंकुर पिता दुकालू का दावा है कि उनके पास इस मामले से संबंधित सभी दस्तावेज उपलब्ध हैं, जिन्हें सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त किया गया है। उनका आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेरफेर, पहचान संबंधी दस्तावेजों में बदलाव तथा मुआवजा वितरण में अनियमितता के कारण उन्हें वर्षों से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
अब यह मामला प्रशासनिक जांच का विषय बन चुका है। क्षेत्र के लोगों की मांग है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए तथा यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
अब सबकी निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं कि आखिर 46 वर्षों से दर्ज भू-अभिलेखों, मुआवजा भुगतान और कथित पहचान परिवर्तन के इस जटिल मामले की सच्चाई कब सामने आती है।
डिस्क्लेमर:
यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों एवं संबंधित पक्ष द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर आधारित है। लेख में वर्णित दावे संबंधित पक्ष के हैं। इन तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। मामले की वास्तविक स्थिति सक्षम प्रशासनिक अथवा न्यायिक जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी।





