1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर बने छत्तीसगढ़ राज्य को अब 26 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। राज्य निर्माण के समय उम्मीद थी कि स्थानीय संसाधनों, जनजातीय क्षेत्रों और ग्रामीण जरूरतों को प्राथमिकता देकर विकास की नई इबारत लिखी जाएगी। लेकिन राज्य गठन के ढाई दशक बाद भी यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या विकास वास्तव में गांवों तक पहुंच पाया है या फिर वह अब भी सरकारी फाइलों और घोषणाओं तक सीमित है।
राज्य निर्माण के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों को लंबे समय तक शासन करने का अवसर मिला। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने वर्ष 2000 से 2003 तक नेतृत्व किया। इसके बाद डॉ. रमन सिंह ने लगातार 15 वर्षों तक प्रदेश की कमान संभाली। वर्ष 2018 से 2023 तक भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार कार्य कर रही है।
सत्ता बदली, योजनाएं बदलीं, लेकिन क्या बदली ग्रामीण तस्वीर?
पिछले 26 वर्षों में राज्य में हजारों करोड़ रुपये की योजनाएं संचालित हुईं। पंचायतों को अधिक अधिकार देने, सड़क संपर्क बढ़ाने, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए गए। हाल ही में जारी पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स (PAI) रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ की सभी ग्राम पंचायतों की भागीदारी दर्ज की गई, लेकिन रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि बुनियादी ढांचे और सेवा वितरण के क्षेत्र में अभी सुधार की व्यापक आवश्यकता बनी हुई है।
गरियाबंद जिले का जमीनी सच
यदि गरियाबंद जिले की बात करें तो यह जिला लगभग 5.97 लाख की आबादी वाला क्षेत्र है। जिले में 7 तहसील, 5 विकासखंड, 334 ग्राम पंचायतें और 710 गांव शामिल हैं। इनमें गरियाबंद, छुरा, फिंगेश्वर, देवभोग और मैनपुर प्रमुख विकासखंड हैं। जिले का बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र और आदिवासी बहुल इलाकों से घिरा हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में जिले के विभिन्न गांवों से लगातार ऐसी खबरें सामने आती रही हैं, जिनमें स्कूल भवनों की कमी, खराब सड़कें, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, पेयजल संकट, नेटवर्क समस्या और राशन वितरण में तकनीकी बाधाओं जैसी समस्याएं प्रमुख रही हैं।
सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और इंटरनेट अब भी चुनौती
ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि आज भी अनेक गांव ऐसे हैं जहां बारिश के दौरान सड़क संपर्क टूट जाता है। कई बस्तियों में गंभीर मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए चारपाई या अस्थायी साधनों का सहारा लेना पड़ता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कई गांवों में भवन, शिक्षकों और संसाधनों की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं।
डिजिटल इंडिया और इंटरनेट क्रांति के दौर में भी जिले के अनेक वनांचल क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं सीमित हैं। इससे छात्रों, किसानों और आम नागरिकों को सरकारी सेवाओं का लाभ लेने में कठिनाई होती है।
नक्सल और टाइगर रिजर्व का तर्क, लेकिन कब तक?
गरियाबंद जिले का बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र से आच्छादित है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व और संवेदनशील वन क्षेत्रों के कारण कई विकास परियोजनाओं में प्रशासनिक और पर्यावरणीय बाधाएं सामने आती हैं। वहीं कुछ इलाकों में पूर्व में नक्सल प्रभाव का हवाला भी दिया जाता रहा है। जिले के कुल क्षेत्रफल का बड़ा भाग वन क्षेत्र में आता है।
हालांकि स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि यदि राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाईं तो इसका उत्तरदायित्व केवल भौगोलिक परिस्थितियों पर नहीं डाला जा सकता। उनका मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर यह चर्चा होती है कि यदि जनप्रतिनिधि गांवों की समस्याओं को प्राथमिकता के साथ शासन और प्रशासन तक पहुंचाएं तथा नियमित निगरानी करें तो अनेक समस्याओं का समाधान तेजी से हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण विकास केवल बजट आवंटन से संभव नहीं है। इसके लिए योजनाओं की निगरानी, स्थानीय भागीदारी, जवाबदेही और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। पंचायत व्यवस्था को मजबूत बनाना और ग्राम स्तर पर निर्णय प्रक्रिया को प्रभावी करना विकास की गति बढ़ा सकता है।
सोशल मीडिया बना ग्रामीणों की नई आवाज
पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं को सोशल मीडिया के माध्यम से उठाना शुरू किया है। सड़क, पुल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और राशन जैसी समस्याओं के वीडियो सीधे शासन और प्रशासन तक पहुंच रहे हैं। कई मामलों में सोशल मीडिया पर मुद्दा उठने के बाद प्रशासनिक कार्रवाई भी देखने को मिली है।
यह बदलाव बताता है कि ग्रामीण समाज अब केवल ज्ञापन और धरना तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर अपनी आवाज को व्यापक स्तर तक पहुंचा रहा है।
छत्तीसगढ़ के गठन के 26 वर्ष बाद राज्य ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों की तस्वीर अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती। गरियाबंद जैसे जिलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, बिजली और इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।
विकास की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब दूरस्थ गांवों में रहने वाला नागरिक भी उन्हीं सुविधाओं का लाभ प्राप्त कर सके जो शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध हैं। राज्य निर्माण के 26 वर्ष बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास की धारा अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पाई है, या फिर ग्रामीण जनता को अभी और इंतजार करना होगा।






