राधे पटेल / गरियाबंद भारत की सांस्कृतिक विविधता में कृषि और प्रकृति से जुड़े त्योहारों का विशेष स्थान है। इन्हीं में से एक अत्यंत पावन और उल्लासपूर्ण लोकपर्व है नवाखाई (नुआखाई)। मुख्य रूप से ओडिशा और छत्तीसगढ़ के अंचलों में मनाया जाने वाला यह पर्व नई फसल के स्वागत और धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
नवाखाई का अर्थ और महत्व
‘नवा’ का अर्थ है ‘नया’ और ‘खाई’ का अर्थ है ‘खाना’। नवाखाई का सीधा अर्थ है—नई फसल का पहला अन्न ग्रहण करना। जब धान की फसल पककर तैयार होती है, तब किसान अपनी मेहनत का पहला फल स्वयं खाने से पहले अपने इष्ट देवी-देवताओं और कुलदेवताओं को अर्पित करते हैं। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति से हमें जो कुछ भी मिलता है, उसके प्रति कृतज्ञ रहना हमारा पहला कर्तव्य है।
त्योहार की प्रमुख परंपराएं
नवान्न अर्पण: सुबह स्नान के बाद नए धान से तैयार भोग (खीर या दलिया) कुलदेवी और ग्रामदेवी (जैसे मां समलेश्वरी) को अर्पित किया जाता है।
पारिवारिक एकजुटता: इस दिन परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर नवान्न ग्रहण करते हैं। दूर-दराज रहने वाले लोग भी इस अवसर पर अपने पैतृक घर लौटते हैं।
नुआखाई जुहार: पूजा और भोजन के बाद छोटे, बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और बड़े छोटों को सुख-समृद्धि का आशीष देते हैं। इस परंपरा को ‘नुआखाई जुहार’ कहा जाता है, जो सामाजिक समरसता और आपसी गिले-शिकवे मिटाने का प्रतीक है।
सांस्कृतिक रंग: शाम के समय लोकगीत, संबलपुरी नृत्य और पारंपरिक संगीत के साथ पूरा समाज उत्सव के रंग में डूब जाता है।
नवाखाई केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, किसान और समाज के बीच अटूट रिश्ते का उत्सव है। यह दिन हमें मेहनत का सम्मान करना और मिल-बांटकर खुशियां मनाना सिखाता है।
आप सभी को नुआखाई/नवाखाई की ढेरों शुभकामनाएं! नुआखाई जुहार!


