आरसेटी से प्रशिक्षण लेकर शुरू किया राखी निर्माण, धान-सेमी से लेकर मूंगा, मटर और झुर्गा बीज से तैयार कर रहीं आकर्षक राखियां; 11 अगस्त से भूतेश्वरनाथ धाम में लगेगा स्टॉल
गरियाबंद। खेती-किसानी और घरेलू कामकाज के बीच गांव की महिलाएं अब अपने हुनर को कमाई का जरिया बना रही हैं। जिले के ग्राम सढ़ौली की महिलाएं और बेटियां खेती के साथ राखी निर्माण कर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। ग्रामीण महिलाओं ने रूरल सेल्फ एम्प्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आरसेटी) से प्रशिक्षण लेकर राखी बनाने का काम शुरू किया है।
खास बात यह है कि इन राखियों में बाजार में मिलने वाली सामान्य सजावटी सामग्री के साथ गांव में आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। महिलाएं धान, सेमी, मूंगा, मटर, झुर्गा बीज, रहर दाल और चावल जैसी सामग्री से आकर्षक और पारंपरिक राखियां तैयार कर रही हैं। इसके अलावा रायपुर और दुर्ग से कच्चा माल मंगाकर धागे, स्टोन, सजावटी मोतियों और फैब्रिग्लू से अलग-अलग डिजाइन की राखियां भी बनाई जा रही हैं।
खेत के काम के बाद 2 से 3 घंटे राखी बनाने में
सढ़ौली की महिलाएं खेती और घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के बाद रोजाना करीब 2 से 3 घंटे राखी निर्माण में लगा रही हैं। इस तरह खाली समय का उपयोग कर वे अपने हुनर को छोटे घरेलू उद्यम में बदल रही हैं।
राखी निर्माण से जुड़ी गुंजा ध्रुव, भोजेश्वरी ध्रुव, योगिता कश्यप, मोनिका कश्यप, लिलेश्वरी कश्यप, कांति कश्यप, सरिता ध्रुव, चमेली ध्रुव, अनुरूपा साहू और जयंती पटेल सहित अन्य महिलाएं इस काम में सक्रिय हैं।
भूतेश्वरनाथ धाम में आज से बिक्री
समूह की सदस्य गुंजा ध्रुव ने बताया कि महिलाओं द्वारा तैयार राखियों की बिक्री के लिए 11 अगस्त से भूतेश्वरनाथ धाम में स्टॉल लगाया जाएगा। इसके लिए राखियों को आकर्षक रेडीमेड डिब्बों में पैक करने की व्यवस्था भी महिलाओं ने खुद की है। इससे उत्पाद को बाजार के अनुरूप बेहतर रूप देने के साथ ग्राहकों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
स्थानीय सामग्री से रोजगार का रास्ता
सढ़ौली की महिलाओं का यह प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटे घरेलू उद्यमों की संभावनाओं को भी दिखाता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री, प्रशिक्षण और मेहनत के सहारे महिलाएं खेती के अलावा आय का दूसरा जरिया तैयार कर रही हैं।
राखी निर्माण जैसे छोटे प्रयास से महिलाएं न केवल अपने हुनर को पहचान दे रही हैं, बल्कि परिवार की आमदनी बढ़ाने की दिशा में भी योगदान दे रही हैं। प्रशिक्षण के बाद स्वरोजगार से जुड़कर सढ़ौली की महिलाएं यह संदेश दे रही हैं कि गांव में उपलब्ध संसाधन और हुनर मिल जाएं तो रोजगार का रास्ता घर से भी शुरू किया जा सकता है।




