गरियाबंद: गरियाबंद जिले के देवभोग विकासखंड के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत कोसमकानी एक बार फिर निर्माण कार्यों में बरती जा रही अनियमितताओं को लेकर विवादों के केंद्र में है। यहां ऊपरपीटा–केन्दूवन मार्ग पर स्थित दो पुलियों की मरम्मत के नाम पर सरकारी धन के भारी दुरुपयोग के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, सरकारी रिकॉर्ड और बिल-वाउचर में मरम्मत का काम पूरा दिखाकर भुगतान भी कर दिया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों की पोल खोल रही है। मौके की स्थिति को देखकर सरकारी कार्यों की गुणवत्ता, मूल्यांकन और भुगतान की पूरी प्रक्रिया पर गहरे सवालिया निशान लग गए हैं।

पहला पुल: केवल ऊपर से फ्लोरिंग, नींव पूरी तरह जर्जर
प्राथमिक शाला ऊपरपीटा के समीप स्थित पुरानी पुलिया की मरम्मत के लिए 15वें वित्त आयोग के मद से ₹99,850 का खर्च दर्शाया गया है। जब मीडिया टीम ने मौके का मुआयना किया, तो पाया कि पुलिया का निचला हिस्सा, मुख्य स्तंभ और दोनों किनारों की दीवारें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं।
ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि मजबूती देने के बजाय ठेकेदार और पंचायत प्रतिनिधियों ने केवल ऊपर से फ्लोरिंग (प्लास्टर) कर दी। इससे पुलिया बाहर से तो नई और ठीक दिखती है, लेकिन अंदर से उसकी हालत बेहद खतरनाक है। स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है कि यदि इस जर्जर पुलिया से कोई भारी वाहन गुजरता है, तो कभी भी कोई बड़ा और जानलेवा हादसा हो सकता है।

दूसरा पुल: कागजों में पास हुआ बिल, मौके से काम नदारद
ऊपरपीटा–केन्दूवन मार्ग की दूसरी पुलिया को लेकर हो रहा भ्रष्टाचार का खेल और भी ज्यादा चौंकाने वाला है। पंचायत के रिकॉर्ड के अनुसार, इस पुलिया की मरम्मत के नाम पर भी ठीक ₹99,850 का बिल तैयार कर लिया गया है।

हैरानी की बात यह है कि मौके पर किसी भी प्रकार के नए निर्माण, मरम्मत या निर्माण सामग्री के उपयोग का एक भी भौतिक प्रमाण मौजूद नहीं है। यह पुलिया आज भी अपनी पुरानी और बदहाल स्थिति में खड़ी है, जो रोजमर्रा सफर करने वाले राहगीरों, स्कूली बच्चों, किसानों और मवेशियों के लिए सीधा खतरा बनी हुई है।
सिस्टम से उठते सबसे बड़े सवाल
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई ज्वलंत सवाल खड़े कर दिए हैं:
यदि दोनों पुलियों की मरम्मत पर लगभग दो लाख रुपये की सरकारी राशि खर्च हुई है, तो जमीन पर उसका परिणाम क्यों शून्य है?
यदि काम अधूरा या हुआ ही नहीं है, तो तकनीकी अधिकारियों ने मूल्यांकन (Valuation) कैसे किया और भुगतान किस आधार पर कर दिया गया?
क्या बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के ही सरकारी खजाने को खाली किया जा रहा है?
इन सवालों का जवाब अब संबंधित पंचायत सचिव, तकनीकी अमले (इंजीनियर) और जनपद स्तर के बड़े अधिकारियों को देना होगा।
ग्रामीण घनश्याम बीसी का दर्द और आक्रोश
इस मामले में स्थानीय नागरिक घनश्याम बीसी ने मीडिया के सामने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा:

“मैं रोज इसी सड़क से आना-जाना करता हूं। पुलिया की हालत देखकर हमेशा डर लगा रहता है। मरम्मत के नाम पर करीब एक लाख रुपये खर्च होने की बात कही जा रही है, लेकिन जमीन पर पुलिया आज भी जस की तस टूटी और जर्जर दिखाई देती है। हमें तो ऐसा लगता है कि केवल कागजों में काम पूरा दिखा दिया गया है। प्रशासन इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।”
पुराने निर्माण भी हैं सवालों के घेरे में

यह कोई पहला मामला नहीं है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि वर्तमान सरपंच अपने पिछले कार्यकाल में भी इस पद पर काबिज थे। उनके पिछले कार्यकाल के दौरान इस मार्ग पर निर्मित लगभग 7 पुल-पुलियों में से कई महज दो से तीन वर्षों के भीतर ही क्षतिग्रस्त हो गए थे। गुणवत्ताहीन निर्माण का यह सिलसिला पंचायत में लगातार जारी है।

ग्रामीणों की प्रशासन से दो टूक मांग
इस भारी अनियमितता को देखते हुए ग्रामीणों ने जिले के कलेक्टर, जिला पंचायत और जनपद पंचायत के अधिकारियों से तत्काल और सख्त हस्तक्षेप की मांग की है।
उनकी प्रमुख मांग है कि दोनों पुलियों की एक स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, जिसमें माप पुस्तिका (MB), बिल-वाउचर और भुगतान रिकॉर्ड का भौतिक सत्यापन (Physical Audit) शामिल हो। यदि जांच में वित्तीय अनियमितता और नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संलिप्त अधिकारियों, पंचायत प्रतिनिधियों और ठेकेदार के विरुद्ध कठोर कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।





