राधे पटेल / गरियाबंद
गरियाबंद। छत्तीसगढ़ सरकार जहां एक ओर “सुशासन” और बच्चों के अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करती है, वहीं दूसरी ओर गरियाबंद जिले के ग्राम पोखरा में आयोजित सुशासन तिहार कार्यक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनपद पंचायत फिंगेश्वर द्वारा आयोजित इस सरकारी शिविर में व्यवस्था संभालते और नाश्ता-शरबत परोसते नाबालिग बच्चे नजर आए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह सब प्रभारी मंत्री, स्थानीय विधायक और कलेक्टर की मौजूदगी में होता रहा, लेकिन किसी जिम्मेदार अधिकारी ने इसे रोकना जरूरी नहीं समझा। सुशासन तिहार और खली कुर्सी
कार्यक्रम स्थल पर बच्चों के गले में “सुशासन तिहार” लिखे बैच लटकाए गए थे और उनसे मेहमानों की सेवा कराई जा रही थी। जिन हाथों में किताबें और स्कूल बैग होने चाहिए थे, उन हाथों में ट्रे और शरबत के गिलास थमा दिए गए। यह दृश्य केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सरकार के उन दावों पर सवाल है जिनमें बच्चों के अधिकार और शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है।
कानून जनता के लिए अलग, सरकार के लिए अलग?
विडंबना यह है कि यही प्रशासन निजी दुकानों, होटलों और संस्थानों में बाल श्रम मिलने पर कार्रवाई करने का दावा करता है। श्रम विभाग और प्रशासन समय-समय पर बाल श्रम विरोधी अभियान चलाते हैं, लेकिन जब सरकारी कार्यक्रम में ही नाबालिग बच्चों से काम कराया गया तो जिम्मेदार अधिकारी मौन नजर आए।
भारत में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी या सेवा कार्य कराना कानूनन अपराध है। बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम के तहत ऐसा करने पर कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकारी मंच पर कानून की अनदेखी करना “सुशासन” की नई परिभाषा है?
सवाल पूछे गए तो जवाब से बचते दिखे जिम्मेदार
मामले को लेकर जब प्रभारी मंत्री और जिला कलेक्टर से सवाल पूछा गया तो स्पष्ट जवाब देने के बजाय वे कैमरे और सवालों से बचते नजर आए। अधिकारियों की यह चुप्पी पूरे मामले को और गंभीर बना रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यही घटना किसी निजी होटल, ढाबे या दुकान में सामने आती तो प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता, लेकिन सरकारी कार्यक्रम होने के कारण सब कुछ सामान्य मान लिया गया।
सुशासन या दिखावटी आयोजन?
सरकार सुशासन तिहार के जरिए योजनाओं और प्रशासनिक उपलब्धियों का प्रचार कर रही है, लेकिन जमीन पर सामने आ रहे ऐसे दृश्य सरकारी दावों की सच्चाई बयान कर रहे हैं। बच्चों के गले में “सुशासन” का बैच डालकर उनसे सेवा कराना केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतीक है जहां कानून और संवेदनशीलता मंच के भाषणों तक सीमित नजर आती है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले में कोई जिम्मेदारी तय होगी, या फिर यह मामला भी सरकारी आयोजनों की भीड़ में दबकर रह जाएगा।


