1 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया छत्तीसगढ़, कभी कहलाता था दक्षिण कोसल; 1924 में उठी अलग राज्य की मांग, कई पीढ़ियों के संघर्ष और राजनीतिक प्रयासों के बाद मिली पहचान
रायपुर। छत्तीसगढ़ केवल एक राज्य का नाम नहीं, बल्कि यहां की मिट्टी, संस्कृति, भाषा, परंपरा, आदिवासी अस्मिता और वर्षों के संघर्ष की पहचान है। 1 नवंबर का दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ देश के 26वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। आज 1 नवंबर 2026 को राज्य अपना 26वां स्थापना दिवस मना रहा है और राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे हो चुके हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि छत्तीसगढ़ का नाम कैसे पड़ा? प्राचीन काल में इसे किस नाम से जाना जाता था? अलग राज्य बनाने की मांग सबसे पहले किसने उठाई? किन नेताओं ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया? आखिर मध्यप्रदेश से अलग होने की जरूरत क्यों महसूस हुई और संसद में राज्य निर्माण का कानून कैसे पास हुआ?
आइए जानते हैं छत्तीसगढ़ के सृजन से लेकर आज तक की पूरी ऐतिहासिक कहानी।
छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: कभी कहलाता था दक्षिण कोसल
आज जिस भूभाग को हम छत्तीसगढ़ के नाम से जानते हैं, उसका इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को दक्षिण कोसल (दक्षिण कौशल) के नाम से जाना जाता था। इसका उल्लेख प्राचीन साहित्य और ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है।
मान्यता है कि भगवान श्रीराम की माता कौशल्या का संबंध इसी दक्षिण कोसल क्षेत्र से था। इसी वजह से छत्तीसगढ़ को माता कौशल्या की भूमि के रूप में भी जाना जाता है।
इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में इस क्षेत्र पर अनेक राजवंशों का शासन रहा। इनमें प्रमुख रूप से पांडुवंशियों और कलचुरी शासकों का उल्लेख मिलता है। रतनपुर लंबे समय तक इस क्षेत्र का प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा।
लगभग 750 ईस्वी के आसपास रतनपुर में हैहयवंशी कलचुरी सत्ता की स्थापना का उल्लेख मिलता है। इसके बाद इस क्षेत्र में मंदिरों, तालाबों, धार्मिक स्थलों और स्थापत्य कला का विकास हुआ।
सिरपुर, मल्हार, रतनपुर, राजिम और बारसूर जैसे ऐतिहासिक स्थल इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रमाण हैं।
छत्तीसगढ़ नाम कैसे पड़ा?
छत्तीसगढ़ नाम की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हैं। सामान्य रूप से इसे 36 गढ़ों यानी 36 किलों की भूमि से जोड़कर देखा जाता है।
ऐतिहासिक रूप से इस नाम का उल्लेख मराठा शासनकाल के अभिलेखों में मिलता है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मराठों के शासन के दौरान छत्तीसगढ़ नाम का प्रचलन अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया।
हालांकि 36 गढ़ों की संख्या और उनकी ऐतिहासिक सूची को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए इसे एक प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के रूप में समझना उचित होगा।
मराठा शासन से अंग्रेजों तक का सफर
18वीं शताब्दी में नागपुर के भोंसले मराठा शासकों का इस क्षेत्र पर प्रभाव स्थापित हुआ। बाद में अंग्रेजी शासन का विस्तार हुआ और यह भूभाग ब्रिटिश भारत के सेंट्रल प्रोविंसेज (मध्य प्रांत) के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बना।
इस क्षेत्र में कई रियासतें भी थीं। बस्तर, कांकेर, सरगुजा और अन्य रियासतों की अपनी अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएं थीं।
आजादी के बाद इन रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ। इसके बाद छत्तीसगढ़ का अधिकांश क्षेत्र मध्यप्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में शामिल हो गया।
1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद छत्तीसगढ़ क्षेत्र मध्यप्रदेश का हिस्सा बना रहा। यहीं से अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रयासों का नया दौर शुरू हुआ।
अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग सबसे पहले किसने उठाई?
छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की मांग किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल का प्रयास नहीं थी। इसके पीछे कई दशकों तक चले सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक प्रयासों का योगदान रहा।
इस मांग की शुरुआती पृष्ठभूमि 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में तैयार होने लगी थी।
पंडित माधवराव सप्रे का योगदान
पंडित माधवराव सप्रे ने वर्ष 1900 के दशक में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ पत्रिका के माध्यम से क्षेत्रीय समस्याओं, सामाजिक चेतना और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी। इसने क्षेत्रीय अस्मिता की भावना को मजबूती दी।
वर्ष 1924: पृथक राज्य की पहली औपचारिक मांग
वर्ष 1924 में रायपुर जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक में वामनराव लाखे ने अलग छत्तीसगढ़ की मांग उठाई। इसे पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की शुरुआती औपचारिक राजनीतिक मांगों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
इसके बाद यह विचार राजनीतिक चर्चाओं में बना रहा, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में इसे राज्य का रूप नहीं मिल सका।
डॉ. खूबचंद बघेल और पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन
डॉ. खूबचंद बघेल स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय पहचान के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को संगठित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1956: डॉ. खूबचंद बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ महासभा का गठन हुआ। इस संगठन ने अलग राज्य की मांग को आगे बढ़ाया।
1967: छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ की स्थापना कर क्षेत्रीय एकता और राज्य निर्माण की मांग को मजबूत करने का प्रयास किया गया।
उनका मानना था कि छत्तीसगढ़ की अपनी भाषा, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक परिस्थितियां हैं। इसलिए यहां के लोगों की जरूरतों के अनुसार अलग प्रशासनिक व्यवस्था होनी चाहिए।
ठाकुर प्यारेलाल सिंह और अन्य आंदोलनकारियों की भूमिका
ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने छत्तीसगढ़ के सामाजिक और श्रमिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1946 में छत्तीसगढ़ क्षेत्र के हितों और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले संगठित प्रयासों में उनकी भूमिका रही।इसके अलावा बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, द्वारिका प्रसाद तिवारी, दशरथ चौबे सहित अनेक नेताओं ने अलग राज्य की मांग को जीवित रखा।
वर्ष 1953 में फजल अली की अध्यक्षता में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष भी छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की मांग रखी गई। लेकिन आयोग ने इसे स्वीकार नहीं किया। वर्ष 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा बना रहा।
1970 से 1990 के दशक तक आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार
वर्ष 1970 के दशक में छत्तीसगढ़ की पहचान, श्रमिक अधिकारों और स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर कई आवाजें उठीं।कामरेड शंकर गुहा नियोगी ने मजदूरों और स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के माध्यम से श्रमिक आंदोलन को संगठित किया गया।
वर्ष 1983 में संत पवन दीवान ने पृथक छत्तीसगढ़ की मांग को लेकर राजनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाया।
1990 का दशक निर्णायक साबित हुआ।
इस दौरान पृथक राज्य निर्माण की मांग को राजनीतिक समर्थन मिलने लगा।
चंदूलाल चंद्राकर ने सर्वदलीय छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण मंच के माध्यम से अलग राज्य की मांग को व्यापक राजनीतिक मंच प्रदान किया।
कांग्रेस और भाजपा सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस मांग का समर्थन किया।
सभाएं, रैलियां, ज्ञापन और बंद जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए।
विधानसभा से लेकर प्रधानमंत्री के वादे तक
1991: मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर प्रस्ताव पेश करने के प्रयास हुए।
18 मार्च 1994: मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक छत्तीसगढ़ निर्माण के समर्थन में अशासकीय संकल्प सर्वसम्मति से पारित हुआ। यह राज्य निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम था।
1998: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रायपुर की चुनावी सभा में अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का वादा किया। उन्होंने कहा था कि उन्हें छत्तीसगढ़ क्षेत्र से 11 सांसद दिए जाएं, वे अलग छत्तीसगढ़ राज्य देंगे।
इसके बाद केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनने और राज्य निर्माण के राजनीतिक निर्णय ने इस मांग को निर्णायक मोड़ दिया।
वर्ष 2000: संसद में कैसे पास हुआ छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का कानून?
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के पुनर्गठन का प्रस्ताव आगे बढ़ाया। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राज्य निर्माण की प्रमुख तारीखें इस प्रकार हैं:
| तारीख | महत्वपूर्ण घटना |
|---|---|
| 25 जुलाई 2000 | लोकसभा में मध्यप्रदेश पुनर्गठन विधेयक पेश किया गया। |
| 31 जुलाई 2000 | लोकसभा से विधेयक पारित हुआ। |
| 9 अगस्त 2000 | राज्यसभा से विधेयक पारित हुआ। |
| 25 अगस्त 2000 | राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने विधेयक को मंजूरी दी। |
| 1 नवंबर 2000 | छत्तीसगढ़ भारत के 26वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। |
इस कानून का नाम मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 (Madhya Pradesh Reorganisation Act, 2000) रखा गया।
इस अधिनियम के तहत मध्यप्रदेश के 16 जिलों को अलग करके छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया।
ये 16 जिले थे:
बस्तर
बिलासपुर
दंतेवाड़ा
धमतरी
दुर्ग
जांजगीर-चांपा
जशपुर
कांकेर
कवर्धा
कोरबा
कोरिया
महासमुंद
रायगढ़
रायपुर
राजनांदगांव
सरगुजा
इस तरह 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ ने एक अलग राज्य के रूप में अपनी नई यात्रा शुरू की।
छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री और राज्यपाल कौन थे?

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 1 नवंबर 2000 को राज्य की पहली सरकार का नेतृत्व संभाला। वे कांग्रेस पार्टी से थे।

छत्तीसगढ़ के पहले राज्यपाल बने। नए राज्य की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने में उनकी भूमिका रही।
छत्तीसगढ़ विधानसभा का पहला सत्र 14 दिसंबर 2000 को आयोजित हुआ। पहली विधानसभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल निर्वाचित हुए।
छत्तीसगढ़ के अब तक के मुख्यमंत्री: किसके कार्यकाल में क्या हुआ?
राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब तक चार मुख्यमंत्री रहे हैं। इनके कार्यकाल में राज्य की राजनीति, प्रशासन, विकास योजनाओं और प्राथमिकताओं में अलग-अलग बदलाव देखने को मिले।
छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री। नए राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, मंत्रालय, विभागों और संस्थाओं की स्थापना का शुरुआती दौर इनके कार्यकाल में रहा।
लगातार तीन कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सड़क, बिजली, कृषि और स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं को प्रमुखता मिली।
इनके कार्यकाल में किसानों, धान खरीदी, गोधन न्याय योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर कई योजनाएं लागू की गईं।
13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे छत्तीसगढ़ के चौथे मुख्यमंत्री हैं। आदिवासी बहुल राज्य को पहला आदिवासी मुख्यमंत्री मिलने के कारण भी उनका कार्यकाल महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी और प्रशासनिक विकास
राज्य गठन के समय रायपुर को राजधानी बनाया गया। शुरुआती दौर में प्रदेश में 16 जिले थे। प्रशासनिक जरूरतों और स्थानीय स्तर पर बेहतर सुविधाएं पहुंचाने के उद्देश्य से समय-समय पर नए जिले बनाए गए।
आज 2026 में छत्तीसगढ़ में कुल 33 जिले और 5 संभाग हैं।
1 नवंबर 2000 को 16 जिलों के साथ राज्य का गठन।
2007 में बीजापुर और नारायणपुर नए जिले बने।
2012 में गरियाबंद सहित 9 नए जिलों का गठन हुआ।
2014 में दुर्ग संभाग अस्तित्व में आया।
2018 में नया रायपुर का नाम बदलकर अटल नगर किया गया।
2020 में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला बना।
2022 में पांच नए जिलों का गठन हुआ। इससे जिलों की संख्या 33 हो गई।
1 नवंबर 2025 को नवा रायपुर में नए विधानसभा भवन का लोकार्पण हुआ।
छत्तीसगढ़ की पहचान: खनिज, जंगल, किसान और आदिवासी संस्कृति
प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। धान की व्यापक खेती के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है।
इसके अलावा यहां की पहचान निम्नलिखित विशेषताओं से है:
कृषि: धान, मक्का, दलहन और तिलहन की खेती।
खनिज संपदा: कोयला, लौह अयस्क और बॉक्साइट।
वन संपदा: तेंदूपत्ता, महुआ, साल और अन्य वनोपज।
आदिवासी संस्कृति: गोंड, बैगा, हल्बा, कमार, भुंजिया सहित अनेक समुदायों की परंपराएं।
लोककला: पंथी, राउत नाचा, सुआ नृत्य, करमा और गेड़ी नृत्य।
पर्यटन: चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़, सिरपुर, राजिम, भोरमदेव और बारनवापारा।
प्रदेश का राजकीय गीत ‘अरपा पैरी के धार’ है, जो छत्तीसगढ़ की नदियों, प्रकृति और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पीछे आखिर क्या कारण थे?
इतिहास को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि आखिर अलग राज्य बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई।
पृथक छत्तीसगढ़ की मांग के पीछे मुख्य रूप से पांच कारण माने जाते हैं।
1. अलग सांस्कृतिक पहचान: छत्तीसगढ़ की अपनी बोली, लोकगीत, लोकनृत्य, परंपराएं और सामाजिक जीवनशैली रही है। स्थानीय लोगों का मानना था कि इस पहचान के अनुसार अलग प्रशासनिक व्यवस्था होनी चाहिए।
2. प्रशासनिक दूरी: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से छत्तीसगढ़ का बड़ा क्षेत्र भौगोलिक रूप से काफी दूर था। दूरस्थ इलाकों तक सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक सुविधाओं को पहुंचाने में कठिनाइयां महसूस की जाती थीं।
3. आदिवासी क्षेत्रों का विकास: बस्तर, सरगुजा और अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार जैसी सुविधाओं को बेहतर बनाने की जरूरत थी।
4. स्थानीय संसाधनों पर अधिकार और विकास: छत्तीसगढ़ खनिज, जंगल और जल संसाधनों से समृद्ध था। क्षेत्रीय नेतृत्व चाहता था कि यहां के संसाधनों से होने वाले विकास का लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचे।
5. क्षेत्रीय असंतुलन की भावना: लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि क्षेत्र की आर्थिक क्षमता और प्राकृतिक संपदा के अनुरूप विकास नहीं हो रहा है। अलग राज्य बनने से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएं बनाने और लागू करने में सुविधा होगी।
इस प्रकार अलग राज्य की मांग केवल राजनीतिक मांग नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक सुविधा, क्षेत्रीय पहचान और विकास की आकांक्षाओं से भी जुड़ी हुई थी।
26 साल बाद छत्तीसगढ़: कितनी बदली तस्वीर और कितनी बाकी है चुनौती?
1 नवंबर 2000 से 1 नवंबर 2026 तक छत्तीसगढ़ ने 26 वर्षों का सफर पूरा कर लिया है। इस दौरान प्रदेश ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सिंचाई, उद्योग, संचार और शहरी विकास के क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
रायपुर और नवा रायपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में आधुनिक सुविधाओं का विस्तार हुआ है। बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़ और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं।
लेकिन राज्य के विकास की तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।
आज भी कई दूरस्थ आदिवासी अंचलों में अच्छी सड़क, नियमित स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पेयजल और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है। वनांचल के गांवों में प्रशासनिक पहुंच, किसानों की समस्याएं, सिंचाई, स्थानीय रोजगार और विस्थापन जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
विशेषकर बस्तर, सरगुजा और गरियाबंद जिले के दूरस्थ वनांचलों में विकास की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना अभी भी एक बड़ी जिम्मेदारी है।
छत्तीसगढ़ के गठन का मूल उद्देश्य केवल एक नया नक्शा तैयार करना नहीं था, बल्कि स्थानीय लोगों को बेहतर प्रशासन और विकास के अवसर उपलब्ध कराना भी था। इसलिए 26 वर्षों की उपलब्धियों के साथ इन अधूरे लक्ष्यों की समीक्षा भी जरूरी है।
स्थापना दिवस का महत्व: सिर्फ उत्सव नहीं, अपने इतिहास को याद करने का दिन
यह दिन उन सभी महापुरुषों, समाज सुधारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, राजनीतिक नेताओं और आंदोलनकारियों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की अलग पहचान और राज्य निर्माण के लिए अपना योगदान दिया।
आज जरूरत है कि नई पीढ़ी छत्तीसगढ़ के इतिहास को जाने, अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए तथा प्रदेश के विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे।
छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस: महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| स्थापना दिवस | 1 नवंबर |
| राज्य गठन का वर्ष | 2000 |
| भारत का क्रम | 26वां राज्य |
| प्राचीन नाम | दक्षिण कोसल |
| प्रारंभिक जिले | 16 |
| वर्तमान जिले | 33 |
| संभाग | 5 |
| राजधानी | रायपुर |
| पहला मुख्यमंत्री | अजीत जोगी |
| पहला राज्यपाल | दिनेश नंदन सहाय |
| वर्तमान मुख्यमंत्री | विष्णुदेव साय |
| राज्य स्थापना कानून | मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 |
| राजकीय गीत | अरपा पैरी के धार |
| राज्य स्थापना के 26 वर्ष | 1 नवंबर 2026 |
छत्तीसगढ़ का निर्माण किसी एक दिन में लिया गया निर्णय नहीं था। इसके पीछे वर्षों की सोच, क्षेत्रीय अस्मिता, राजनीतिक प्रयास और स्थानीय विकास की आकांक्षाएं थीं। दक्षिण कोसल से लेकर आधुनिक छत्तीसगढ़ तक का यह सफर हमारी ऐतिहासिक विरासत और सामूहिक पहचान का प्रतीक है।
आज स्थापना दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्य गठन के समय देखे गए सपने प्रदेश के अंतिम गांव और अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पाए हैं? जब तक वनांचल के बच्चों को बेहतर शिक्षा, किसानों को उचित अवसर, युवाओं को रोजगार और ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं, तब तक विकास की यह यात्रा अधूरी रहेगी।
छत्तीसगढ़ का गौरव केवल उसकी खनिज संपदा में नहीं, बल्कि यहां के मेहनतकश किसान, आदिवासी समाज, लोकसंस्कृति और आम जनता में बसता है।
जय जोहार! जय छत्तीसगढ़!




