करीब 100 ग्रामीण कलाकारों ने तीन घंटे तक किया राम-रावण युद्ध का जीवंत मंचन, रावण दहन के बजाय निभाई जाती है अनूठी परंपरा
दर्रीपारा (गरियाबंद) । आधुनिकता और बदलते समय के बीच भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराएं आज भी जीवंत हैं। इसकी अनूठी मिसाल गरियाबंद जिले के दर्रीपारा-कोसमी में देखने को मिली, जहां करीब 300 वर्षों से चली आ रही देवदशहरा की परंपरा को ग्रामीणों ने पूरे उत्साह, आस्था और समर्पण के साथ निभाया। विजयादशमी के अगले दिन एकादशी पर आयोजित इस पारंपरिक पर्व में मिट्टी के रावण के साथ राम और रावण की सेनाओं के युद्ध का जीवंत मंचन किया गया। भगवान श्रीराम की सेना की जीत के साथ देवदशहरा का आयोजन संपन्न हुआ।
इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि यहां आम दशहरे की तरह रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। इसके बजाय ग्रामीण दो दलों में बंटकर भगवान श्रीराम और रावण की सेनाओं के रूप में आमने-सामने आते हैं और पारंपरिक युद्ध का अभिनय करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
देवी-देवताओं की डांग-डोली के साथ निकला पारंपरिक आयोजन
जिला मुख्यालय गरियाबंद से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित दर्रीपारा-कोसमी में देवदशहरा का आयोजन विशेष धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार किया जाता है। पर्व के अवसर पर शाम होते ही दोनों गांवों के देवी-देवताओं की डांग-डोली, सिरहा और बैगा कोसमी में पुजारी के घर के पास एकत्रित हुए।
यहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार देवी-देवताओं की भेंट-मुलाकात और पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद सभी रावणभाटा मैदान पहुंचे, जहां देवदशहरा का मुख्य आयोजन हुआ। धार्मिक आस्था और पारंपरिक रस्मों के बीच ग्रामीणों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत का निर्वहन किया।
तीन घंटे तक चला राम-रावण सेना का युद्ध
कोसमी के रावणभाटा मैदान में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में करीब 100 ग्रामीण कलाकारों ने राम-रावण युद्ध का पारंपरिक अभिनय किया। ग्रामीण दो दलों में विभाजित होकर भगवान श्रीराम और राजा रावण की सेना के रूप में मैदान में उतरे।
एक ओर भगवान श्रीराम की सेना के जयघोष गूंज रहे थे, तो दूसरी ओर रावण की सेना भी पारंपरिक नारों और युद्ध के प्रदर्शन के साथ मैदान में डटी रही। दोनों दलों के बीच करीब तीन घंटे तक पारंपरिक युद्ध का रोमांचक मंचन चला। कलाकारों ने आमने-सामने आकर युद्ध की विभिन्न मुद्राओं और पारंपरिक शैली का प्रदर्शन किया।
मैदान में मौजूद ग्रामीण दर्शक इस अनूठे आयोजन को उत्सुकता से देखते रहे। अंततः भगवान श्रीराम की सेना की जीत के साथ युद्ध समाप्त हुआ। इस तरह मिट्टी के रावण से जुड़े पारंपरिक युद्ध के मंचन के साथ देवदशहरा का पर्व संपन्न हुआ।
आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीण
करीब तीन शताब्दियों से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए आसपास के अनेक गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण कोसमी पहुंचे। इनमें आंदोरा, जैतपुरी, आमदी, जोबा, भीरालाट, केराबहारा, पंडरीपानी, सेमरा, खरता, रावनडिग्गी, देवरीबाहरा, मोहलाई, खुटगांव, खुर्सीपार, सेम्हरढाप, आमागांव, बोईरगांव और चिपरी सहित अन्य गांवों के लोग शामिल रहे।
आयोजन के दौरान पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह और पारंपरिक लोकसंस्कृति का माहौल देखने को मिला। ग्रामीणों ने इस आयोजन में शामिल होकर अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव प्रदर्शित किया।
रावण दहन नहीं, युद्ध की परंपरा है खास पहचान
देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन दर्रीपारा-कोसमी का देवदशहरा अपनी अलग परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध का जीवंत मंचन आयोजन का प्रमुख आकर्षण है। मिट्टी के रावण से जुड़ी इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ सामूहिक भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।
ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बना हुआ है।
नई पीढ़ी तक पहुंच रही पूर्वजों की विरासत
करीब 300 वर्षों से चली आ रही देवदशहरा की परंपरा को ग्रामीणों द्वारा लगातार निभाया जाना क्षेत्र की समृद्ध लोकसंस्कृति के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। बदलते दौर में भी करीब 100 ग्रामीण कलाकारों का एक साथ युद्ध का मंचन करना और बड़ी संख्या में लोगों का आयोजन में शामिल होना इस परंपरा की जीवंतता को प्रदर्शित करता है।
दर्रीपारा-कोसमी का देवदशहरा इस बात का उदाहरण है कि लोकपरंपराएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि समुदाय की पहचान और सामूहिक आस्था का जीवंत स्वरूप भी हैं।







