मैनपुर से महज 8 किमी दूर स्कूल भवन जर्जर; पांच कक्षाओं के 48 बच्चों की जिम्मेदारी एक प्रधान पाठक के कंधों पर
गरियाबंद। मैनपुर मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत पत्थर्री की प्राथमिक शाला आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रही है। वर्ष 1988 में बने इस स्कूल भवन की छत अब तक खपरैल की ही है। करीब 38 साल पुराने भवन में वर्तमान में पहली से पांचवीं कक्षा तक लगभग 48 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में भी यहां प्राथमिक शाला पथर्री दर्ज है।
जर्जर भवन और पुरानी खपरैल की छत को देखकर बारिश के मौसम में बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होते हैं। खास बात यह है कि यह स्कूल किसी दुर्गम इलाके में नहीं, बल्कि मैनपुर मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद दशकों पुराने भवन की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है।
48 बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा एक प्रधान पाठक पर
स्कूल में भवन की समस्या के साथ शिक्षकों की कमी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। जानकारी के अनुसार पिछले शिक्षा सत्र में नियमित शिक्षक की कमी के कारण दूसरे स्कूल से शिक्षक की व्यवस्था कर बच्चों की पढ़ाई संचालित की गई थी।
वर्तमान शिक्षा सत्र में करीब 48 बच्चों के लिए एक ही प्रधान पाठक पदस्थ हैं। उन्हें स्कूल की कार्यालयीन जिम्मेदारियों के साथ बच्चों की पढ़ाई भी संभालनी पड़ रही है। पहली से पांचवीं तक पांच कक्षाओं के बच्चों की पढ़ाई एक शिक्षक के भरोसे संचालित होना शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सवाल यह भी है कि प्रधान पाठक प्रशासनिक और कार्यालयीन कामकाज संभालें या पांचों कक्षाओं के बच्चों को पर्याप्त समय देकर पढ़ाएं? दोनों जिम्मेदारियां एक साथ निभाने की स्थिति में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
जर्जर भवन और शिक्षक की कमी, बच्चों पर दोहरी मार
पत्थर्री प्राथमिक शाला में बच्चों को एक साथ दो बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर करीब चार दशक पुराना खपरैल वाला भवन है, तो दूसरी ओर पर्याप्त शिक्षकों का अभाव।
ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल भवन की स्थिति लंबे समय से खराब है। इसके बावजूद अब तक पक्की छत अथवा नए भवन के लिए ठोस समाधान नजर नहीं आया। बारिश के दौरान पुराने भवन की स्थिति बच्चों और शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बन जाती है।
स्कूल भवनों की मरम्मत और सुविधाओं को लेकर मैनपुर क्षेत्र में पहले भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में पत्थर्री का मामला भी विभाग के लिए गंभीरता से देखने वाला विषय है।
खबर के बाद कार्रवाई की बात, अब पत्थर्री की बारी
मामले को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर से चर्चा किए जाने पर उन्होंने विभागीय बैठकों और विभिन्न शिकायतों के निराकरण की प्रक्रिया का हवाला दिया। उनका कहना है कि जिला कार्यालय में अलग-अलग समस्याओं को लेकर लोग शिकायत लेकर पहुंचते हैं और प्रशासनिक व न्यायालयीन मामलों के साथ विभागीय कार्य भी चलते रहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब किसी विषय को लेकर पत्रकार खबर प्रकाशित करते हैं तो विभाग संबंधित मामले में कार्रवाई अथवा आवश्यक आदेश जारी करता है।
ऐसे में अब देखना होगा कि पत्थर्री प्राथमिक शाला की जर्जर छत और शिक्षकों की कमी पर विभाग कितनी जल्दी संज्ञान लेता है।
38 साल पुराने भवन को पक्की छत का इंतजार
वर्ष 1988 में बने भवन में पढ़ रहे बच्चों को आज भी पक्की छत का इंतजार है। वहीं पांच कक्षाओं के 48 बच्चों की जिम्मेदारी एक प्रधान पाठक के भरोसे है। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में नामांकन तक सीमित नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित भवन और पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
अब ग्रामीणों और पालकों की नजर विभाग की अगली कार्रवाई पर है। सवाल सीधा है—1988 से खपरैल के नीचे पढ़ रहे पत्थर्री के 48 बच्चों को पक्की छत और पर्याप्त शिक्षक आखिर कब मिलेंगे?
वेब पर उपलब्ध एक हालिया ग्राउंड रिपोर्ट में भी पत्थर्री स्कूल के वर्ष 1988 में बने खपरैल वाले भवन का उल्लेख किया गया है।




