राधे पटेल / गरियाबंद छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों आरक्षण का मुद्दा सबसे ज्वलंत विषय बना हुआ है। हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जिसमें पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार से जुड़े नेता वर्तमान भाजपा की ‘डबल इंजन’ सरकार पर सवाल उठा रहे हैं कि राज्य और केंद्र दोनों जगह सत्ता होने के बावजूद राजभवन में पिछले 3 वर्षों से अटका आरक्षण विधेयक पास क्यों नहीं हो रहा है।
क्या है 76% आरक्षण का विवाद? दिसंबर 2022 में तत्कालीन भूपेश बघेल (कांग्रेस) सरकार ने विधानसभा में सर्वसम्मति से दो आरक्षण संशोधन विधेयक पारित किए थे, जिनका उद्देश्य राज्य में कुल आरक्षण को बढ़ाकर 76% करना था । इस नए फॉर्मूले के तहत अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 32%, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27%, अनुसूचित जाति (SC) के लिए 13% और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 4% कोटे का प्रावधान किया गया था ।हालाँकि, तत्कालीन राज्यपाल अनुसुइया उइके ने इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50% की आरक्षण सीमा का हवाला देते हुए सरकार से कई सवाल पूछे । तब से लेकर आज तक (लगभग 3 साल बाद भी) यह विधेयक राजभवन और न्यायपालिका के बीच अटका हुआ है।
सियासी आरोप-प्रत्यारोप यह गतिरोध अब एक बड़े राजनीतिक टकराव में बदल चुका है। विपक्ष (कांग्रेस) का आरोप है कि भाजपा राजभवन का इस्तेमाल कर आदिवासियों (विशेषकर बस्तर के 32% ST आरक्षण) और पिछड़े वर्गों के अधिकारों को जानबूझकर रोक रही है। कांग्रेस का तर्क है कि जब भाजपा शासित अन्य राज्य 50% की सीमा पार कर सकते हैं, तो छत्तीसगढ़ में इसे क्यों रोका जा रहा है? वायरल वीडियो इसी आक्रोश का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें मांग की गई है कि सरकार आदिवासियों और ओबसी के आरक्षण पर अपना रुख स्पष्ट करे।
वर्तमान विष्णु देव साय सरकार की रणनीति इस संवैधानिक और राजनीतिक गतिरोध से निपटने के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली मौजूदा भाजपा सरकार ने दोतरफा रणनीति अपनाई है:
स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण: राज्यव्यापी 76% कोटे के रुके होने के कारण होने वाले सियासी नुकसान से बचने के लिए, साय कैबिनेट ने हाल ही में त्रि-स्तरीय पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में OBC को अधिकतम 50% तक आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला किया है । यह आरक्षण केवल उन निकायों में लागू होगा जहां ST और SC का कुल आरक्षण 50% से कम है ।
‘बस्तर 2.0’ और आदिवासी विकास: बस्तर के आदिवासियों (जो 32% ST कोटे की पुरजोर मांग कर रहे हैं) की नाराजगी दूर करने के लिए साय सरकार ने केंद्र के साथ मिलकर ‘बस्तर 2.0’ योजना शुरू की है । इसके तहत 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे और सड़क, पुल जैसे ढांचागत व सांस्कृतिक विकास पर भारी जोर दिया जा रहा है, ताकि आरक्षण के मुद्दे से ध्यान हटाकर समग्र विकास पर केंद्रित किया जा सके ।
छत्तीसगढ़ में आरक्षण अब केवल एक कानूनी या प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक प्रमुख चुनावी और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। जब तक सुप्रीम कोर्ट 50% की सीमा के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट और अंतिम संवैधानिक फैसला नहीं सुनाता, तब तक राज्य में आरक्षण का यह ‘डबल इंजन’ बनाम ‘राजभवन’ का राजनीतिक गतिरोध ऐसे ही जारी रहने की संभावना है।


