मैनपुर। मैनपुर स्थित आईटीआई संस्था में सृष्टि के सृजनकर्ता और आदि शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की जयंती श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। भगवान विश्वकर्मा को शिल्प, निर्माण, वास्तुकला और तकनीकी कौशल का प्रतीक माना जाता है। विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2026 को मनाई गई और इस अवसर पर मशीनों, औजारों तथा कार्यस्थल की पूजा की परंपरा निभाई गई।
संस्था परिसर में सुबह 11 बजे से भगवान विश्वकर्मा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और हवन प्रारंभ हुआ। संस्था के शिक्षकगणों और विद्यार्थियों ने हवन में आहुतियां अर्पित कर संस्था, समाज, ग्राम और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। पूजा के बाद विशेष आरती की गई और श्रद्धालुओं व विद्यार्थियों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।
औजारों और मशीनों का किया गया पूजन
विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर संस्था में परंपरानुसार औजारों, मशीनों और तकनीकी संसाधनों की पूजा की गई। विश्वकर्मा पूजा में कार्यस्थल पर उपयोग होने वाले औजारों और मशीनों की साफ-सफाई कर उन्हें सम्मान देने की परंपरा है।
कार्यक्रम में मौजूद शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भगवान विश्वकर्मा से तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति, सुरक्षित कार्य वातावरण और कौशल विकास की कामना की।
एलुमनी मीट में पूर्व विद्यार्थियों का सम्मान
विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर आईटीआई संस्था की ओर से एलुमनी मीट का भी आयोजन किया गया। इसमें संस्था से प्रशिक्षण प्राप्त कर रोजगार, नौकरी और स्वरोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे पूर्व विद्यार्थी शामिल हुए।
संस्था के प्राचार्य ने अपने-अपने ट्रेड में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले पूर्व विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र और मोमेंटो भेंटकर सम्मानित किया। इस दौरान पूर्व विद्यार्थियों ने आईटीआई से मिले कौशल प्रशिक्षण, रोजगार के अवसरों और अपने अनुभवों को साझा किया।
पूर्व विद्यार्थियों ने जूनियर विद्यार्थियों से कहा कि तकनीकी कौशल और हुनर जीवन में आत्मनिर्भर बनने का मजबूत माध्यम है। उन्होंने विद्यार्थियों को लगन के साथ प्रशिक्षण लेने, अपने ट्रेड में दक्षता बढ़ाने और रोजगार के साथ स्वरोजगार के अवसर तलाशने का संदेश दिया।
कौशल से ही बनेगा सशक्त समाज
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्था के प्राचार्य ने कहा कि कला, निर्माण और तकनीकी क्षेत्रों में जो भी सौंदर्य और प्रगति दिखाई देती है, उसमें भगवान विश्वकर्मा की प्रेरणा निहित है। भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रथम वास्तुकार, शिल्पकार और इंजीनियर माना जाता है।
उन्होंने कहा कि औजार और मशीनें प्रगति का आधार हैं, लेकिन उनका सही उपयोग करने के लिए कौशल, अनुशासन और सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार और तकनीकी क्षेत्र में उन्नति के माध्यम से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है।
प्राचार्य ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि हुनर केवल प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि जीवनयापन और आत्मनिर्भरता का माध्यम है। विद्यार्थियों को अपने कौशल पर विश्वास रखते हुए निरंतर सीखते रहना चाहिए।
जाडापदर में हुआ प्रतिमा विसर्जन
कार्यक्रम के अगले दिन भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ जडापदर ग्राम में भ्रमण कराया गया। इस दौरान श्रद्धालु डीजे की धुन पर नाचते-गाते हुए शोभायात्रा में शामिल हुए। बाद में प्रतिमा को तालाब ले जाकर विधि-विधान से विसर्जित किया गया।
प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। आयोजन में संस्था के शिक्षक, विद्यार्थी, पूर्व विद्यार्थी, श्रद्धालु और क्षेत्रवासी बड़ी संख्या में शामिल रहे।



