राधे पटेल / गरियाबंद गरियाबंद ।जिले सहित पूरे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी समिति प्रबंधक संघ के आह्वान पर प्रदेश के 902 लघु वनोपज प्रबंधकों ने 22 अप्रैल 2026 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का ऐलान कर दिया है। वर्षों से लंबित मांगों के निराकरण नहीं होने से नाराज प्रबंधकों ने अब निर्णायक संघर्ष का रास्ता अपनाया है।
संघ द्वारा शासन-प्रशासन को कई बार ज्ञापन और निवेदन दिए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से प्रबंधकों में भारी आक्रोश व्याप्त है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष सन्नी साहू ने बताया कि प्रबंधक विगत लगभग 38 वर्षों से सुदूर वनांचल क्षेत्रों में वनोपज संग्रहण, समितियों के संचालन तथा विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें आज तक नियमित कर्मचारी का दर्जा, समुचित वेतनमान, पेंशन, मेडिकल एवं अन्य शासकीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गई हैं।
संघ का कहना है कि यह स्थिति प्रबंधकों के साथ लगातार हो रहे शोषण का प्रतीक है। प्रबंधक संघ की प्रमुख मांगों में नियमितीकरण, वेतन मैट्रिक्स लेवल 07, 08 एवं 09 लागू करना, सेवा सुरक्षा, पेंशन, अनुकंपा नियुक्ति एवं लंबित भुगतान का निराकरण शामिल है। प्रबंधकों का आरोप है कि पूर्व में कई बार आश्वासन दिए गए, यहां तक कि मांगों पर विचार के लिए कमेटी गठन और नियमित बैठक का भरोसा भी दिलाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
संघ के अनुसार, हड़ताल के चलते प्रदेश में तेंदूपत्ता संग्रहण, 67 प्रकार के लघु वनोपज की समर्थन मूल्य खरीदी, बीमा, छात्रवृत्ति, बोनस वितरण सहित कई योजनाओं के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। गौरतलब है कि प्रदेश में लाखों ग्रामीण परिवार वनोपज पर निर्भर हैं, जिनकी आजीविका इस व्यवस्था से जुड़ी हुई है।
खरीदी शुरू, ज्यादा नुकसान की आशंका
गरियाबंद जिले में भी प्रबंधकों द्वारा अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का निर्णय लेते हुए संबंधित विभाग को ज्ञापन सौंप दिया गया है। जिले में 18 अप्रैल से तेंदूपत्ता खरीदी प्रारंभ हो चुकी है, ऐसे में हड़ताल का सीधा असर यहां के लगभग 80 हजार ग्रामीण परिवारों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
तेंदूपत्ता संग्रहण, भुगतान एवं प्रबंधन कार्य प्रभावित होने से स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ सकता है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।


