पलायन रोकने की बात, जमीन पर उल्टा खेल — रोजगार की जगह गरजीं मशीनें
तालाब के नाम पर जंगल की बलि_हरे-भरे पेड़ काटे, सबूत मिटाने लकड़ी जलाई ।
गरियाबंद। गरियाबंद जिले के उदंती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। वन्यप्राणियों के लिए पानी की व्यवस्था के नाम पर तालाब निर्माण के दौरान हरे-भरे पेड़ों को काटने और बाद में उनके सबूत मिटाने का मामला सामने आया है।
मामला उदंती टाइगर रिजर्व के तौरंगा वन परिक्षेत्र के अंतर्गत कोकड़ी गांव के पास का है, जहां जंगल के अंदर वन्यप्राणियों के पीने के लिए तालाब बनाया जा रहा है। आरोप है कि इस निर्माण कार्य में नियमों को ताक पर रखकर दर्जनों हरे-भरे पेड़ों को जेसीबी मशीन से उखाड़ दिया गया। इतना ही नहीं, कटे हुए पेड़ों को मौके से हटाकर कुछ को मिट्टी में दफना दिया गया और कई लकड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया, ताकि निर्माण के दौरान हुई कटाई का कोई ठोस सबूत न बच सके।
बताया जा रहा है कि करीब 7 लाख रुपये की लागत से बनाए जा रहे इस तालाब में स्थानीय मजदूरों को काम देने की बजाय जेसीबी मशीन और ट्रैक्टर का इस्तेमाल किया गया। जबकि जिला प्रशासन लगातार पलायन रोकने और ग्रामीणों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने की बात कर रहा है। ऐसे में मजदूरों की जगह मशीनों से काम कराए जाने पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शुरुआत में ग्रामीणों को फावड़ा और घमेला लेकर बुलाया गया और खुदाई करते हुए फोटो भी खिंचवाए गए। लेकिन अगले ही दिन मशीनें पहुंच गईं और पूरा काम जेसीबी से कराया जाने लगा। इससे न सिर्फ जंगल को नुकसान हुआ बल्कि ग्रामीण मजदूरों को मिलने वाला रोजगार भी छिन गया।
हैरानी की बात यह भी है कि निर्माण स्थल पर किस योजना के तहत तालाब बनाया जा रहा है, इसकी जानकारी देने वाला कोई सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि यह कार्य किस योजना से स्वीकृत हुआ और इसकी वास्तविक लागत कितनी है।
इस मामले में जब तौरंगा परिक्षेत्र के रेंजर के.आर. कोरचे से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि तालाब ग्रामीणों की अनुमति से बनवाया जा रहा है और पेड़ कटने के लिए ग्रामीण ही जिम्मेदार हैं वहीं उदंती टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक वरुण जैन ने कहा कि “मामला उनके संज्ञान में आया है और वे इसकी जांच करवाएंगे कि लकड़ियों को आग क्यों लगाई गई। जहां आप सिर्फ मशीन का बात कह रहे हैं, नियम यह है कि पूरा कार्य का 75% लेबरों के माध्यम से और 25% मशीनों से काम किया जाता है ।”एक ओर प्रशासन ग्रामीणों को गांव में रोजगार देने और पलायन रोकने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विभागीय स्तर पर मशीनों से काम कराकर मजदूरों के हाथ से रोजगार छीनने और जंगल के हरे-भरे पेड़ों की बलि देने का मामला सामने आना कई सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना होगा कि जांच के बाद इस मामले में जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है।