15-17 दिन से आश्रम परिसर में पड़े हैं पौधे, 50-60 बच्चों के बीच जहरीले जीव-जंतुओं का भी खतरा
मैनपुर। एक तरफ वन विभाग पौधरोपण और हरियाली बढ़ाने के अभियान चलाने के दावे करता है, दूसरी तरफ मैनपुर क्षेत्र में पौधों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। ग्राम बड़े गोबरा की आश्रम शाला में करीब 400 नन्हे सागौन के पौधे पिछले 15-17 दिनों से खुले में पड़े हैं। पौधों को जमीन में रोपने की बजाय आश्रम परिसर में इस तरह छोड़ दिया गया है कि अब सवाल उठ रहा है—क्या इन पौधों को जंगल और जमीन तक पहुंचाना था या आश्रम परिसर में सड़ाकर खत्म करना?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पौधे अगर वन विभाग ने रोपण के लिए भेजे हैं तो उनकी निगरानी कौन कर रहा है? सामान्य वन मंडल के रेंजर, बीट गार्ड और संबंधित वनकर्मियों की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पौधे पहुंचाने तक है? इसके बाद पौधे जिएं या मरें, इसकी कोई चिंता नहीं? बारिश के अनुकूल मौसम में भी करीब 400 पौधों का 15-17 दिन तक खुले में पड़े रहना विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पिछले साल भी इसी बड़े गोबरा आश्रम शाला में करीब 400 से अधिक पौधे लाकर छोड़ दिए गए थे। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार समय पर रोपण और देखरेख नहीं होने से वे पौधे सड़कर और खराब होकर बर्बाद हो गए। अब एक साल बाद फिर लगभग उसी तरह पौधों को परिसर में छोड़ दिया गया है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि पिछले साल की गलती से विभाग ने आखिर क्या सीखा?

वन विभाग की ओर से पौधरोपण के नाम पर हर साल अभियान चलाए जाते हैं। गरियाबंद जिले में वर्ष 2024 में ही 1 लाख 40 हजार से अधिक पौधों का वृहद पौधरोपण अभियान चलाया गया था। लेकिन सवाल पौधों की संख्या गिनाने का नहीं, उन्हें बचाने का है। हजारों-लाखों पौधे लगाने के दावे तब बेमानी लगते हैं, जब सैकड़ों नन्हे पौधे रोपण स्थल तक पहुंचने से पहले ही लापरवाही की भेंट चढ़ने लगें।
बड़े गोबरा की आश्रम शाला में करीब 50 से 60 बच्चे रहते हैं। बारिश के दिनों में आश्रम परिसर में सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा बना रहता है। ऐसे में बड़ी संख्या में पौधों को परिसर में खुले में इधर-उधर छोड़ देना बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से भी सवाल खड़ा करता है। हरियाली के नाम पर बच्चों की सुरक्षा से समझौता तो नहीं किया जा रहा? यह सवाल भी जिम्मेदार अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पौधे रोपण के लिए लाए गए हैं तो उन्हें तत्काल निर्धारित स्थानों पर लगाया जाना चाहिए। पौधों को इस तरह खुले में छोड़ने से उनकी जड़ों और पूरे पौधे के खराब होने का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों का आरोप है कि मैदानी अमले की निगरानी के बावजूद पौधों की ऐसी स्थिति बनी हुई है, जिससे विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
विडंबना देखिए—जिस विभाग की जिम्मेदारी जंगल और पेड़ों को बचाने की है, उसी विभाग के सागौन पौधे अगर उसके ही जिम्मेदार कर्मचारियों की लापरवाही से बर्बाद होने लगें तो सवाल उठेंगे ही। रेंजर से लेकर बीट गार्ड और वनकर्मियों तक की जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है कि पौधे कब लाए गए, किस स्थान पर लगाए जाने थे और अब तक उन्हें जमीन क्यों नहीं मिली।
अब देखना यह है कि वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर इन पौधों को बचाने की कार्रवाई करते हैं या फिर पिछले साल की तरह इस साल भी करीब 400 सागौन के नन्हे पौधे सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़कर सड़ जाएंगे। सवाल सिर्फ 400 पौधों का नहीं है, सवाल उस सरकारी सोच का है जिसमें पौधा लगाने से ज्यादा आसान शायद पौधा मरने के बाद उसकी गिनती करना हो गया है।

