राधे पटेल / गरियाबंद गरियाबंद जिले के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने न सिर्फ मानव-वन्यजीव संघर्ष बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आमामोरा गांव की 70 वर्षीय वृद्ध महिला उषा रोज़ की तरह तेंदूपत्ता तोड़ने जंगल गई थी, लेकिन वह अचानक लापता हो गई। परिजनों और ग्रामीणों ने उसकी तलाश शुरू की, जो करीब 48 घंटे तक जारी रही।
नदी में मिली जिंदगी और मौत के बीच झूलती महिला
दूसरे दिन शाम करीब 4 बजे ग्रामीणों को उसा पास की नदी में मिली। वह बेहोशी की हालत में पानी के अंदर पड़ी थी और केवल उसका सिर ही दिखाई दे रहा था। आशंका है कि जंगली भालू के हमले से अपनी जान बचाने के लिए वह किसी तरह नदी तक पहुंची और पानी में चली गई।
ग्रामीणों का कहना है कि रास्ता भटकने और शाम का समय होने के कारण उसका सामना भालू से हुआ, जिसने उस पर हमला कर दिया। इस हमले में महिला के सिर, आंख, हाथ, पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं।
दरअसल, इस क्षेत्र में भालू जैसे खतरनाक वन्यजीवों की मौजूदगी आम है और तेंदूपत्ता सीजन में जंगलों में जाने से ऐसे हमलों का खतरा और बढ़ जाता है ।
8 किलोमीटर पैदल, फिर भी नहीं जागा सिस्टम
घटना के बाद ग्रामीणों ने मानवता दिखाते हुए घायल महिला को
- करीब 8 किलोमीटर जंगल से पैदल गांव तक लाया
इसके बाद 108 एंबुलेंस को कॉल किया गया…
लेकिन यहीं से शुरू होती है सिस्टम की असली कहानी
👉 5 घंटे तक एंबुलेंस नहीं पहुंची
मजबूरी में किराए की गाड़ी, 15 किमी बाद मिली 108
जब कोई मदद नहीं मिली, तो ग्रामीणों ने किराए की गाड़ी की व्यवस्था की और महिला को अस्पताल के लिए रवाना हुए।
हैरानी की बात यह है कि—
👉 करीब 15 किलोमीटर चलने के बाद रास्ते में 108 एंबुलेंस मिली
यह सवाल खड़ा करता है—
- अगर समय पर एंबुलेंस पहुंचती, तो क्या हालत इतनी गंभीर होती?
- क्या ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन सेवा सिर्फ कागजों में ही है?
अस्पताल से अस्पताल भटकती रही जिंदगी
बेहोशी की हालत में उसा को अस्पताल लाया गया, जहां
- पहले मैनपुर अस्पताल रेफर किया गया
- फिर गरियाबंद जिला चिकित्सालय भेजा गया
👉 यह दिखाता है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था भी पूरी तरह सक्षम नहीं है।
बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
यह घटना सिर्फ एक भालू हमले की नहीं है, बल्कि तीन बड़ी विफलताओं की कहानी है—
- वन क्षेत्र में सुरक्षा की कमी
- आपातकालीन 108 सेवा की लापरवाही
- ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी
पहले भी गरियाबंद में भालू हमलों के दौरान एंबुलेंस और सिस्टम की सुस्ती पर सवाल उठ चुके हैं ।
तेंदूपत्ता तोड़ने गई एक वृद्ध महिला—जो अपने परिवार की आजीविका के लिए जंगल गई थी—आज जिंदगी और मौत से जूझ रही है।
लेकिन असली सवाल यह है—
👉 क्या यह सिर्फ एक हादसा है?
👉 या फिर सिस्टम की लगातार अनदेखी का परिणाम?
जब तक जंगल क्षेत्रों में
✔ सुरक्षा
✔ समय पर चिकित्सा सुविधा
✔ और जवाबदेही
नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे… और हर बार एक नई “उषा” सिस्टम की लापरवाही की शिकार बनती रहेगी।


अस्पताल से अस्पताल भटकती रही जिंदगी