मोंगराडीह में जल-जंगल-जमीन बचाओ संघर्ष समिति की महाबैठक, 17 अक्टूबर को कोकड़ी में होगी विशाल महाग्राम सभा; सांसदों और विधायकों को बुलाने का निर्णय
मैनपुर। उदंती-सीतानदी क्षेत्र में विस्थापन की आशंका, वन अधिकार और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर ग्रामीणों की आवाज अब संगठित आंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है। शनिवार, 10 अक्टूबर को राजापड़ाव क्षेत्र के ग्राम मोंगराडीह में जल-जंगल-जमीन बचाओ संघर्ष समिति की विशाल महाबैठक आयोजित हुई। आयोजकों के अनुसार, 128 गांवों और पारा-टोलों के प्रतिनिधियों तथा हजारों ग्रामीणों ने इसमें भाग लिया। सभा में ग्रामीणों ने स्पष्ट संदेश दिया—हमें अपना गांव छोड़कर कहीं और नहीं जाना, हमें अपने क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाएं चाहिए।
बैठक का शुभारंभ समिति के मुखियाओं ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और माटी महतारी की पूजा-अर्चना के साथ किया। समिति अध्यक्ष सिरधन सोम के निर्देश पर महासचिव रेवा देवदास ने बैठक का एजेंडा प्रस्तुत किया। चर्चा के दौरान महिलाओं ने भी क्षेत्र की समस्याओं, अधिकारों और विस्थापन की आशंकाओं को प्रमुखता से उठाया।
विस्थापन के सवाल पर मुखर हुए ग्रामीण, विकास की मांग
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और गांवों के पुनर्वास का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। ग्रामीणों की चिंता है कि संरक्षण के नाम पर उनके पारंपरिक निवास, खेती-किसानी और जीवनशैली पर असर नहीं पड़ना चाहिए। उनका कहना है कि क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर करने के साथ ही उनके संवैधानिक और वन अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
सभा में संगठन का विस्तार गांव-गांव तक करने, ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने, क्षेत्र में लागू नाइट कर्फ्यू पर रोक लगाने और विस्थापन पर रोक की मांग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। वन ग्रामों के किसानों को भूमि पर अधिकार दिलाने तथा धमतरी और गरियाबंद जिले के जनप्रतिनिधियों को एक मंच पर लाकर ग्रामीणों से सीधा संवाद कराने की रणनीति भी बनाई गई।
‘जल-जंगल-जमीन पर मूल निवासियों के अधिकारों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं’
समिति अध्यक्ष सिरधन सोम ने कहा कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची से जुड़े अधिकारों और आदिवासी समुदायों के हितों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। जल, जंगल और जमीन से जुड़े पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि समिति संवैधानिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी रखेगी और ग्रामीणों के अधिकारों के लिए संगठित प्रयास किए जाएंगे।
जिला पंचायत सदस्य लोकेश्वरी नेताम ने कहा कि 128 गांवों और पारा-टोलों के लोगों के बीच विस्थापन को लेकर चिंता है। ग्रामीणों को विस्थापन नहीं, विकास चाहिए। उन्होंने संगठन को जातिवाद, पार्टीवाद और क्षेत्रवाद से दूर रखने की अपील करते हुए कहा कि गांवों की एकजुटता ही संघर्ष समिति की सबसे बड़ी ताकत है।
समिति के संरक्षक दैनिक राम मंडावी ने संगठन को मजबूत बनाने के लिए प्रत्येक गांव से एक युवा, एक बुजुर्ग मुखिया और एक शिक्षित महिला को जोड़ने का सुझाव दिया। सभा को अर्जुन नायक, घनश्याम मरकाम, नरेश मांझी सहित अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया।
क्या कहती है विस्थापन नीति? ग्रामीणों के अधिकार और विकल्प समझना जरूरी
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में विस्थापन का सवाल केवल प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं है। इसमें वन्यजीव संरक्षण, वन अधिकार, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों की सहमति जैसे महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हैं।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अनुसार, बाघ अभयारण्यों के गांवों के स्वैच्छिक पुनर्वास के लिए पुनर्वास पैकेज के तहत दो विकल्प निर्धारित किए गए हैं। पहले विकल्प में पात्र परिवार को प्रति परिवार करीब 10 लाख रुपये का पैकेज देकर अपनी व्यवस्था से पुनर्वास का विकल्प दिया गया है। दूसरे विकल्प में संबंधित विभाग के माध्यम से गांव का पुनर्वास कराया जाता है। वास्तविक पात्रता, प्रक्रिया और लागू शर्तों की पुष्टि संबंधित अधिकारियों से की जानी चाहिए।
इसके अलावा, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 यानी वन अधिकार अधिनियम (FRA) वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देने का प्रावधान करता है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के अनुसार, अधिकारों की मान्यता और कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना वनवासियों को बेदखल किए जाने से संरक्षण मिलता है। संरक्षित क्षेत्रों में पुनर्वास के मामलों में भी संबंधित कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण है।
ऐसे में ग्रामीणों की मांग है कि किसी भी निर्णय से पहले उनके अधिकारों, आजीविका, खेती, आवास और पुनर्वास से जुड़ी परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाए। साथ ही, क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए ठोस कार्ययोजना बनाई जाए। हालांकि, प्रत्येक गांव पर विस्थापन लागू होने या सभी गांवों के तत्काल विस्थापन की स्थिति की पुष्टि संबंधित सरकारी आदेशों और गांववार दस्तावेजों से ही की जा सकती है।
17 अक्टूबर को कोकड़ी में महाग्राम सभा, सांसद-विधायकों को न्योता
मोंगराडीह की बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि शनिवार, 17 अक्टूबर को राजापड़ाव क्षेत्र के ग्राम कोकड़ी में विशाल महाग्राम सभा आयोजित की जाएगी। इसमें 128 गांवों की मांगों को लोकसभा और विधानसभा तक पहुंचाने के उद्देश्य से कांकेर और महासमुंद लोकसभा क्षेत्रों के सांसदों, सिहावा और बिंद्रानवागढ़ के विधायकों, जिला पंचायत अध्यक्ष तथा अन्य जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा।
इसके लिए 12 अक्टूबर को समिति के जिम्मेदार पदाधिकारी और मुखिया संबंधित जनप्रतिनिधियों के निवास पर पहुंचकर उन्हें निमंत्रण देंगे। प्रस्तावित महाग्राम सभा में ग्रामीणों की समस्याओं, वन अधिकारों, विस्थापन नीति और विकास कार्यों पर जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद करने की योजना है।
महिलाओं और युवाओं की भागीदारी पर जोर
बैठक में समिति अध्यक्ष सिरधन सोम, जिला पंचायत सदस्य लोकेश्वरी नेताम, टीकम नागवंशी, रेवा देवदास, दैनिक राम मंडावी, घनश्याम मरकाम, नरेश मांझी, कृष्ण कुमार नेताम, धनेश मरकाम, नगीना बाई, सिया बाई, गायत्री बाई और ललिता बाई सहित अनेक प्रतिनिधि मौजूद रहे। आयोजकों ने 118 गांवों और पारा-टोलों से ग्रामीणों की उपस्थिति की जानकारी दी।
मोंगराडीह की बैठक ने साफ कर दिया कि ग्रामीण अपने क्षेत्र के भविष्य से जुड़े फैसलों में भागीदारी चाहते हैं। अब सबकी निगाहें 17 अक्टूबर को कोकड़ी में होने वाली महाग्राम सभा पर टिकी हैं, जहां यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ग्रामीणों की मांगों पर जनप्रतिनिधि और प्रशासन क्या रुख अपनाते हैं।
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