भारत में बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को रोकने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए पॉक्सो एक्ट (POCSO – Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) लागू किया गया। यह भारतीय कानूनी प्रणाली का एक बेहद अहम और सख्त कानून है, जिसने बाल यौन शोषण के मामलों से निपटने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया।
आइए जानते हैं कि यह कानून कब लागू हुआ और इससे जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलू क्या हैं:
पॉक्सो एक्ट कब लागू हुआ? (Implementation Date)
संसद में पारित: यह विधेयक 2012 में भारतीय संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा पारित किया गया था।
राष्ट्रपति की मंजूरी: 22 मई 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति ने इस बिल को अपनी मंजूरी दी।
लागू होने की तिथि: यह कानून पूरे देश में आधिकारिक तौर पर 14 नवंबर 2012 (बाल दिवस) के अवसर पर लागू किया गया था। इसका संचालन ‘महिला एवं बाल विकास मंत्रालय’ (Ministry of Women and Child Development) के अंतर्गत किया जाता है।
पॉक्सो एक्ट लागू करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
पॉक्सो एक्ट से पहले, भारत में बच्चों के यौन शोषण से निपटने के लिए कोई विशेष कानून नहीं था। मामले ‘भारतीय दंड संहिता (IPC)’ के तहत दर्ज होते थे, जिसमें कई खामियां थीं:
जेंडर-न्यूट्रल नहीं था: IPC के कई कानून केवल लड़कियों की सुरक्षा करते थे, जबकि छोटे लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण के लिए स्पष्ट कानून नहीं थे।
सहमति की उम्र का विवाद: पहले के कानूनों में स्पष्टता की कमी थी, जिससे अपराधी अक्सर ‘बच्चे की सहमति’ का बहाना बनाकर बच जाते थे।
बाल-अनुकूल प्रक्रिया का अभाव: कोर्ट और पुलिस थानों का माहौल बच्चों के लिए डरावना होता था, जिससे वे खुलकर सच नहीं बोल पाते थे।
इन सभी कमियों को दूर करने के लिए एक विशेष ‘पॉक्सो एक्ट’ लाया गया।
पॉक्सो एक्ट से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलू और नियम
1. ‘बच्चे’ की स्पष्ट परिभाषा (उम्र सीमा)
पॉक्सो एक्ट की धारा 2(d) के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति (लड़का, लड़की या थर्ड जेंडर) को ‘बच्चा’ माना गया है। कानून स्पष्ट करता है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा दी गई ‘सहमति’ की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं है।
2. अपराधों का वर्गीकरण
इस कानून के तहत अपराधों को उनकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है:
यौन हमला (Sexual Assault): बच्चे के शरीर को गलत नीयत से छूना।
गंभीर यौन हमला (Aggravated Sexual Assault): हथियार के बल पर, पुलिस/शिक्षक/रिश्तेदार या भरोसेमंद व्यक्ति द्वारा किया गया यौन शोषण।
यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment): गंदे इशारे करना, पीछा करना या अश्लील बातें करना।
चाइल्ड पोर्नोग्राफी (Child Pornography): अश्लील सामग्री के लिए बच्चों का उपयोग करना या ऐसी सामग्री रखना/शेयर करना।
3. पॉक्सो एक्ट 2019 में संशोधन (सजा में सख्ती)
अगस्त 2019 में इस कानून में बड़े बदलाव किए गए, जिससे यह और अधिक सख्त हो गया:
मृत्युदंड (फांसी): बच्चों के साथ गंभीर पेनेट्रेटिव यौन हमले (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के मामलों में अब मृत्युदंड (फांसी) तक का प्रावधान शामिल कर दिया गया है।
उम्रकैद और जुर्माना: अन्य मामलों में न्यूनतम सजा बढ़ाकर 20 साल से लेकर आजीवन कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
4. अनिवार्य रिपोर्टिंग (Mandatory Reporting)
पॉक्सो एक्ट की धारा 19 के तहत, यदि किसी व्यक्ति (शिक्षक, डॉक्टर, पड़ोसी या रिश्तेदार) को पता चलता है कि किसी बच्चे के साथ यौन अपराध हुआ है, तो उसे तुरंत पुलिस या चाइल्डलाइन (1098) को सूचित करना अनिवार्य है। जानकारी छिपाने पर उस व्यक्ति को भी 6 महीने की जेल और जुर्माना हो सकता है।
5. बच्चे के अनुकूल न्याय प्रक्रिया (Child-Friendly Trial)
बच्चे का बयान सादे कपड़ों में महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाता है।
बयान बच्चे के घर या उसकी पसंद की जगह पर दर्ज होता है।
रात के समय बच्चे को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन नहीं बुलाया जा सकता।
कोर्ट में सुनवाई (Trial) के दौरान आरोपी और पीड़ित बच्चे का आमना-सामना नहीं होने दिया जाता (इसके लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या पर्दे का इस्तेमाल होता है)।
6. पहचान गुप्त रखना (Privacy Protection)
इस अधिनियम की धारा 23 के तहत, किसी भी मीडिया संस्थान, अखबार या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पीड़ित बच्चे का नाम, तस्वीर, स्कूल या पते का खुलासा करना सख्त मना है। इसका उल्लंघन करने पर 6 महीने से 1 साल तक की जेल हो सकती है।
7. विशेष अदालतें (Special POCSO Courts)
पॉक्सो मामलों की सुनवाई सामान्य अदालतों की बजाय विशेष पॉक्सो अदालतों (Special Courts) में होती है। कानून में यह निर्देश है कि मामला दर्ज होने के बाद पुलिस 2 महीने में जांच पूरी करे और अदालत 1 साल के भीतर मामले का निपटारा कर फैसला सुनाए (स्पीडी ट्रायल)।
पॉक्सो एक्ट 2012 भारत में बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के लिए एक ढाल के रूप में काम करता है। यह कानून न केवल अपराधियों को कड़ी सजा सुनिश्चित करता है, बल्कि पीड़ित बच्चे को मानसिक आघात से बचाते हुए एक सुरक्षित कानूनी माहौल भी प्रदान करता है।POCSO-amendment-hindi pdf





