राधे पटेल/ गरियाबंद मैनपुर : दशकों तक माओवादी खौफ के साए में जीने के बाद, छत्तीसगढ़ के मैनपुर ब्लॉक का ‘छोटे गोबरा’ गांव अब नक्सल मुक्त होकर शांति और विकास की नई इबारत लिख रहा है। इसी बदलाव की कड़ी में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों द्वारा गांव में एक ‘जन चौपाल’ का आयोजन किया गया, ताकि सीधे ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनी जा सकें। इस चौपाल में जहां विकास कार्यों पर चर्चा हुई, वहीं एक ऐसा मानवीय दर्द भी उभर कर सामने आया, जिसने वहां मौजूद हर शख्स को भावुक कर दिया।
3 साल का इंतजार और एक अनसुनी फरियाद

जन चौपाल के दौरान छोटे गोबरा और समीपस्थ बड़े गोबरा गांव के चार परिवारों ने अपनी रुला देने वाली व्यथा साझा की। परिजनों ने बताया कि आज से करीब तीन वर्ष पूर्व, एक राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा इन चार परिवारों के मुखिया को केवल पूछताछ के नाम पर गांव से ले जाया गया था। लेकिन विडंबना यह है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी आज तक इस मामले में किसी भी प्रकार की कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई है और वे अब तक जेल की सलाखों के पीछे हैं।
घर चलाने का संकट, रिहाई की भावुक अपील
परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य के न होने से इन चारों परिवारों पर रोजी-रोटी का गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। बूढ़े माता-पिता, पत्नी और छोटे बच्चे पिछले तीन सालों से हर दिन इस उम्मीद में गुजारते हैं कि शायद आज उनके घर का मुखिया लौट आए। जन चौपाल में इन परिवारों के आंसुओं ने प्रशासन से केवल एक ही सवाल पूछा— आखिर बिना सुनवाई के यह सजा कब तक? पूरे गांव ने एकजुट होकर प्रशासन से भावुक अपील की है कि उनके मामले की जल्द से जल्द निष्पक्ष सुनवाई हो और उन्हें रिहा कर उनके परिवारों को न्याय दिया जाए।
विधायक जनक राम ध्रुव ने बढ़ाया मदद का हाथ
ग्रामीणों की इस पीड़ा को जन चौपाल में मौजूद क्षेत्रीय विधायक श्री जनक राम ध्रुव ने पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ सुना। उन्होंने एक जनसेवक का फर्ज निभाते हुए पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाया। परिवारों की तात्कालिक आर्थिक स्थिति को देखते हुए, विधायक ध्रुव ने अपनी ओर से उन्हें 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की। इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि वे इस मानवीय मुद्दे को शासन-प्रशासन के उच्च स्तर तक ले जाएंगे ताकि इन परिवारों को जल्द से जल्द न्याय मिल सके।
आगे क्या?
छोटे गोबरा गांव का यह मामला सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि यह उन परिवारों के मानवाधिकार और जीने की जद्दोजहद का सवाल है। एक नक्सल मुक्त गांव के रूप में मुख्यधारा में लौट रहे इन ग्रामीणों की प्रशासन से बहुत उम्मीदें हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जन चौपाल में उठी यह मार्मिक पुकार व्यवस्था के गलियारों में कितनी जल्दी सुनी जाती है।


