मैनपुर | प्रदेश में नौनिहालों को प्राथमिक शिक्षा और पोषण देने वाले आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है। हालात ये हैं कि कहीं ये केंद्र जर्जर भवनों में चल रहे हैं, तो कहीं निजी मकानों, स्कूलों या ग्राम पंचायत भवनों में संचालित होने को मजबूर हैं। एक तरफ सरकार नौनिहालों को सुरक्षित भवन मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रही है, तो दूसरी तरफ जहां भवनों की स्वीकृति मिल भी जाती है, वहां निर्माण एजेंसियां काम अधूरा छोड़कर रफूचक्कर हो जाती हैं।
सिस्टम की लापरवाही और खौफ की ऐसी ही एक रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर गरियाबंद जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित घने जंगलों के बीच बसे ग्राम आममोरा के आश्रित ग्राम ‘हथौड़ाडीह’ से सामने आई है।
गेट लाकर फेंका, लगाया नहीं; निर्माण एजेंसी की भारी लापरवाही
हथौड़ाडीह में आंगनबाड़ी भवन का निर्माण तो शुरू हुआ, लेकिन निर्माण एजेंसी ने इसे अधूरा ही छोड़ दिया। हद तो तब हो गई जब सुरक्षा के लिए लाया गया लोहे का मेन गेट (दरवाजा) भवन के पास लाकर यूं ही फेंक दिया गया। महीनों बीत जाने के बाद भी आज तक उस गेट को भवन में लगाया नहीं गया है।

35 हाथियों का दल कर रहा विचरण, छत पर पनाह लेने को मजबूर ग्रामीण
यह घोर वनांचल इलाका पूरी तरह से हाथी प्रभावित क्षेत्र है। वर्तमान में 35 हाथियों का एक बड़ा झुंड इसी इलाके में लगातार विचरण कर रहा है। हाथी कभी भी गांव में धमक जाते हैं, जिससे ग्रामीणों की जान हमेशा हलक में अटकी रहती है। दहशत का आलम यह है कि हाथियों के हमले से बचने के लिए ग्रामीणों ने इसी अधूरी आंगनबाड़ी भवन की छत पर सीढ़ी लगाकर तंबू तान लिया है। हाथियों के आने पर ग्रामीण इसी छत पर बने आशियाने में छिपकर अपनी जान बचाते हैं।

बिना दरवाजे के आंगनबाड़ी: बच्चों और स्टाफ की जान खतरे में
इस लापरवाही ने नौनिहालों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना दरवाजे के आंगनबाड़ी में पढ़ने वाले छोटे बच्चों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका की जान हर पल खतरे में रहती है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर लोहे का गेट लग जाता, तो हाथियों के हमले या गांव में घुसने की स्थिति में बच्चे और स्टाफ अंदर खुद को सुरक्षित कर सकते थे। लेकिन ठेकेदार की मनमानी से मासूमों को मौत के साये में बैठने को मजबूर होना पड़ रहा है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी?
“मामला संज्ञान में आया है। मैं खुद मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करता हूं और निर्माण एजेंसी को भवन पूरा करने और गेट लगाने के लिए बोलता हूं।”
– वरुण नागेश, जिला अधिकारी, महिला एवं बाल विकास विभाग (गरियाबंद)


