राधे पटेल / गरियाबंद
गरियाबंद जिले के टोरीभुइ गांव में रहने वाले कमार जनजाति के परिवार आज भी खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। बेगरपाला ग्राम पंचायत अंतर्गत आने वाले टोरिभुई गांव का है, जहां करीब एक महीने पहले लगभग 27 हाथियों के झुंड ने जमकर उत्पात मचाते हुए 15 से अधिक परिवारों के घरों को तहस-नहस कर दिया।
पीड़ितों में दुल्लू राम कमार, मंगल कमार समेत 15 कमार और जनजाति परिवार शामिल हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि घटना के बाद वन विभाग ने सिर्फ 3000 रुपये और 50 किलो चावल देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, लेकिन आज तक किसी भी परिवार को उचित मुआवजा नहीं मिला है।
पक्के मकान तोड़े, जरूरी दस्तावेज जलकर खाक
ग्रामीणों के अनुसार हाथियों ने सिर्फ कच्चे नहीं बल्कि पक्के मकानों को भी नुकसान पहुंचाया। घरों में रखे राशन कार्ड, आधार कार्ड, बैंक पासबुक समेत सभी जरूरी दस्तावेज आग में जल गए। परिवारों के कपड़े, घरेलू सामान और बर्तन तक बुरी तरह बर्बाद हो गए। बिजली के लिए लगाए गए सौर प्लेट भी हाथियों ने तोड़ दिए।
घटना के बाद प्रभावित परिवारों की जिंदगी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई है। जिन दस्तावेजों के आधार पर शासन की योजनाओं का लाभ मिलता था, वे अब राख में बदल चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बिना दस्तावेजों के इन परिवारों को मुआवजा आखिर मिलेगा कैसे?
सड़क नहीं, पानी नहीं… फिर भी योजनाओं के बड़े दावे
टोरीभुइ गांव धवलपुर क्षेत्र से लगभग 12 से 15 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव तक पहुंचने के लिए न तो पक्की सड़क, शिक्षा व्यवस्था है और न ही पेयजल की समुचित व्यवस्था। ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सरकार द्वारा कमार जनजाति के विकास के लिए कई योजनाएं चलाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। सरकारी दस्तावेजों में योजनाएं जरूर दिखाई देती हैं, पर गांवों में उनका असर नजर नहीं आता।
रोजगार नहीं, इसलिए पलायन को मजबूर परिवार
हाथियों के हमले और बदहाल जिंदगी के कारण कई परिवार अब गांव छोड़ने लगे हैं। आधे से ज्यादा परिवार रोजगार की तलाश में आंध्र प्रदेश पलायन कर चुके हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यही स्थिति रही तो कई लोग जनगणना और सरकारी रिकॉर्ड से भी बाहर हो जाएंगे।
कमार जनजाति का मुख्य रोजगार बांस से बने बर्तन तैयार करना है, लेकिन सुविधाओं की कमी ने इस परंपरागत रोजगार को भी कमजोर कर दिया है।
बांध का पानी पीने को मजबूर
ग्रामीणों का दर्द सिर्फ टूटी झोपड़ियों तक सीमित नहीं है। गांव में पेयजल की व्यवस्था नहीं होने के कारण लोग बांध का पानी पीने को मजबूर हैं। राशन लाने के लिए भी उन्हें सिकासार जलाशय पार करना पड़ता है, जहां बांस से बनी नाव के सहारे लोग जान जोखिम में डालकर सफर करते हैं।
आखिर जिम्मेदार कौन?
घटना को लगभग एक महीना पूरा होने जा रहा है, लेकिन अब तक प्रभावित परिवारों को उचित राहत नहीं मिल सकी है। ऐसे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं —
- क्या जिम्मेदार ग्राम पंचायत है?
- क्या वन विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है?
- या फिर जिम्मेदार जिला प्रशासन है?
यदि शासन चाहे तो इन परिवारों को सुरक्षित स्थान पर विस्थापित किया जा सकता है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी जनहानि का इंतजार कर रहा है?
गरियाबंद और धवलपुर क्षेत्र में हाथियों का आतंक पहले भी कई बार सामने आ चुका है। बीते वर्षों में हाथियों के हमलों में जनहानि और संपत्ति नुकसान की घटनाएं दर्ज होती रही हैं।
अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इन आदिम जनजाति (कमार ) परिवारों की सुध कब लेता है और उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए जरूरी मदद कब तक मिल पाती है।
नोट: यह समाचार टोरीभुइ निवासी दुल्लू राम कमार द्वारा दी गई जानकारी एवं मौके में देखे गए वास्तविक हालात के आधार पर तैयार किया गया है। समाचार का उद्देश्य प्रभावित कमार जनजाति परिवारों की समस्याओं और जमीनी सच्चाई को शासन एवं प्रशासन तक पहुंचाना है।

