शिक्षक नहीं थे तो खुद संभाली बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी, अब नियमित शिक्षक आ गए फिर भी नहीं टूटा बच्चों से रिश्ता; मानदेय या सम्मान की उम्मीद
मैनपुर। मैनपुर विकासखंड के वनांचल क्षेत्र में शिक्षा के प्रति समर्पण की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो व्यवस्था के साथ-साथ समाज को भी सोचने पर मजबूर करती है। ग्राम पंचायत कोकड़ी के आश्रित ग्राम छिपरी (छिंदभर्री) के शासकीय प्राथमिक शाला में जब शिक्षकों की कमी थी, तब गांव के दिव्यांग युवा बिमल कुमार मरकाम ने बच्चों की पढ़ाई रुकने नहीं दी। पिछले 6-7 वर्षों से बिना किसी मानदेय या वेतन के वे बच्चों को पढ़ाने में अपना समय दे रहे हैं।
ब्लॉक मुख्यालय मैनपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर वनांचल क्षेत्र में स्थित इस गांव में कई वर्ष पहले स्कूल में शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। ऐसे समय में बिमल कुमार ने आगे बढ़कर बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी अपने स्तर पर संभाली। उन्होंने इसके लिए न तो किसी से वेतन मांगा और न ही किसी सरकारी नियुक्ति का इंतजार किया।
नियमित शिक्षक आए, फिर भी बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा

बिमल के मुताबिक अब स्कूल में नियमित शिक्षकों की पदस्थापना हो चुकी है। इसके बावजूद उनका बच्चों से लगाव कम नहीं हुआ। वे आज भी अपनी क्षमता के अनुसार स्कूल पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते हैं।
उनका कहना है कि वर्षों तक बच्चों के साथ रहने के कारण उनसे भावनात्मक जुड़ाव हो गया है। पढ़ाना उनके लिए केवल काम नहीं, बल्कि सेवा बन चुका है।
दिव्यांगता के कारण दूसरा काम करना मुश्किल
बिमल बताते हैं कि दिव्यांगता के कारण उनके लिए शारीरिक मेहनत-मजदूरी का काम करना मुश्किल है। उनका कहना है कि उन्हें पढ़ाने के अलावा कोई दूसरा काम भी नहीं आता। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन के कई वर्ष गांव के बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिए।
इतने वर्षों तक बिना मानदेय के बच्चों को पढ़ाने के बाद अब उन्हें उम्मीद है कि शासन-प्रशासन उनके योगदान को देखते हुए कोई मानदेय या सम्मान प्रदान करेगा, जिससे वे अपना जीवन सम्मानपूर्वक चला सकें।
पंचायत से भी नहीं मिला मानदेय
बिमल के अनुसार, उन्हें इस सेवा के बदले ग्राम पंचायत की ओर से भी किसी तरह का मानदेय या आर्थिक सहयोग नहीं मिलता। शासन की ओर से भी अब तक उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिला है।
ऐसे में सवाल यह है कि वर्षों तक बच्चों की पढ़ाई में योगदान देने वाले इस युवा की सेवा को क्या किसी सरकारी योजना के माध्यम से सम्मानजनक अवसर दिया जा सकता है?
BEO बोले- रिक्त पद आने पर करेंगे विचार
मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी देवनाथ बघेल ने कहा कि विभाग में ‘गौरव शिक्षा प्रदाता’ नाम से योजना संचालित है। यदि ब्लॉक या संबंधित क्षेत्र में पद रिक्त होता है अथवा गौरव शिक्षा प्रदाता के पदों पर नई भर्ती आती है तो नियमानुसार बिमल कुमार का आवेदन लेकर उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पर विचार किया जाएगा।
7 साल की सेवा का सम्मान कब?
बिमल कुमार की कहानी केवल एक व्यक्ति की संघर्षगाथा नहीं, बल्कि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के लिए काम करने वाले उन लोगों की तस्वीर भी सामने लाती है, जो बिना किसी आर्थिक लाभ के बच्चों से जुड़े रहते हैं।
अब देखना यह होगा कि 6-7 वर्षों तक बिना मानदेय बच्चों को पढ़ाने वाले बिमल कुमार के समर्पण को शासन-प्रशासन किस रूप में सम्मान देता है। उनके लिए सरकारी योजना में अवसर मिलता है या सम्मान और मानदेय की उम्मीद यूं ही बनी रहती है, यह आने वाला समय बताएगा।



