अधिकारियों के रेस्ट हाउस और सरकारी आवासों की हर तीन साल में मरम्मत-रंगरोगन, दूसरी ओर करोड़ों की लागत से स्वीकृत स्कूल भवन वर्षों से अधूरे; कई बच्चे जर्जर या वैकल्पिक भवनों में पढ़ने मजबूर
राधे पटेल / गरियाबंद 
मैनपुर। गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखंड मैनपुर में सरकारी व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करने वाली तस्वीर सामने आ रही है। एक ओर अधिकारियों के विश्राम गृह और सरकारी आवासों की नियमित मरम्मत और रंग-रोगन कर उन्हें चकाचक रखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बच्चों के लिए स्वीकृत स्कूल भवन वर्षों से अधूरे पड़े हैं। इसका असर सीधे ग्रामीण और आदिवासी बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
86 स्कूल भवन और जीर्णोद्धार के काम अधूरे

मैनपुर ब्लॉक में मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना के तहत करीब 86 नवीन स्कूल भवनों और जीर्णोद्धार कार्यों को शामिल किया गया था। उपलब्ध विभागीय जानकारी के अनुसार वर्ष 2022-23 से इन कार्यों के लिए करीब 558.82 लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई। आरोप है कि कई काम कागजों में पूर्ण बताए जाने के बावजूद जमीन पर अधूरे हैं और संबंधित शिक्षा विभाग को भवनों का हैंडओवर तक नहीं किया गया है।
मैनपुर में स्कूल भवनों की स्थिति को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। दिसंबर 2025 में तत्कालीन कलेक्टर बीएस उइके ने मैनपुर विकासखंड में स्कूल जतन योजना के तहत स्वीकृत भवनों की वित्तीय एवं भौतिक प्रगति की जांच के लिए समिति गठित की थी। समिति को सात दिन के भीतर फोटोग्राफ सहित जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
13 करोड़ की लागत, करीब 100 स्कूलों का निर्माण

इसी तरह आदिम जाति कल्याण विभाग के माध्यम से मैनपुर ब्लॉक में करीब 100 स्कूल भवनों के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके लिए लगभग 13 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत होने की बात सामने आई है। लेकिन 3 से 4 वर्ष बीतने के बाद भी लगभग 95 प्रतिशत भवन अधूरे बताए जा रहे हैं।
निर्माण कार्य अधूरा रहने का खामियाजा स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। कहीं बच्चे पुराने और जर्जर भवनों में पढ़ रहे हैं तो कहीं स्कूलों का संचालन वैकल्पिक भवनों, निजी मकानों या ऐसे स्थानों पर किया जा रहा है, जो बच्चों के लिए नियमित स्कूल की सुविधाओं से काफी दूर हैं।
हालिया रिपोर्टों में मैनपुर के मोतीपानी गांव में भी स्कूल भवन लंबे समय से अधूरा रहने और बच्चों के वैकल्पिक व्यवस्था में पढ़ने का मामला सामने आया है।
सवाल सिर्फ भवन का नहीं, बच्चों की सुरक्षा का भी

स्कूल भवनों के अधूरे रहने से समस्या केवल पढ़ाई की सुविधा तक सीमित नहीं है। बारिश के मौसम में जर्जर और कच्चे भवनों में कक्षाएं लगने से बच्चों की सुरक्षा भी चिंता का विषय बन जाती है। मैनपुर क्षेत्र में पहले भी जर्जर स्कूल भवनों में बच्चों के पढ़ने के मामले सामने आ चुके हैं।
दूसरी ओर, वर्ष 2022-23 में स्वीकृत स्कूल जतन योजना के कार्यों की गुणवत्ता, आवश्यकता, पूर्णता और निर्माणाधीन कार्यों की स्थिति की जांच के लिए शासन स्तर पर भी निर्देश जारी किए गए थे।
NEWS VEB के 4 सवाल
1. कागजों में पूर्ण तो हैंडओवर क्यों नहीं?
यदि ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग के रिकॉर्ड में भवन पूर्ण हैं तो संबंधित शिक्षा विभाग को उनका हैंडओवर अब तक क्यों नहीं किया गया?
2. अधूरे काम के लिए जिम्मेदार कौन?
करोड़ों रुपए की राशि स्वीकृत होने के बावजूद वर्षों तक भवन अधूरे रहने की जिम्मेदारी किसकी तय की गई है?
3. ठेकेदारों पर कार्रवाई कब?
यदि निर्माण एजेंसियों या ठेकेदारों ने काम बीच में छोड़ा है तो उनके खिलाफ रिकवरी और अन्य कार्रवाई कब होगी?
4. बच्चों को पक्का स्कूल कब मिलेगा?
अगले शिक्षा सत्र तक क्या विभाग सभी अधूरे भवनों को पूरा कर बच्चों को सुरक्षित और सुविधायुक्त स्कूल भवन उपलब्ध करा पाएगा?
पहले भी दिए गए थे सख्त निर्देश
स्कूल जतन योजना और आदिम जाति कल्याण विभाग के निर्माण कार्यों को लेकर प्रशासन पहले भी जांच के निर्देश दे चुका है। दिसंबर 2025 में मैनपुर विकासखंड के स्कूल भवनों की गुणवत्ता और प्रगति की जांच के लिए समिति बनाई गई थी।
इसके बावजूद यदि आज भी बड़ी संख्या में भवन अधूरे हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जांच के बाद जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई हुई और अधूरे निर्माण कार्यों को पूरा कराने की समयसीमा क्या तय की गई?
अब नए प्रशासन से उम्मीद
मैनपुर जैसे आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्र में स्कूल भवन केवल सरकारी निर्माण नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ा बुनियादी ढांचा हैं। अधिकारियों के आवास और विश्राम गृहों की सुविधाओं पर नियमित ध्यान दिया जाता है तो स्कूल भवनों को लेकर भी उसी गंभीरता की जरूरत है। अब स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों की नजर जिला प्रशासन पर है कि वर्षों से अधूरे पड़े स्कूल भवनों को कब पूरा कराया जाता है और बच्चों को सुरक्षित, पक्के तथा सुविधायुक्त स्कूल भवन कब मिलते हैं।



