जगदलपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ की पहचान बने कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान की प्राकृतिक खूबसूरती देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करती है। तीरथगढ़ जलप्रपात, कुटुमसर गुफा और कैलाश गुफा जैसे अद्भुत पर्यटन स्थल प्रकृति की अनमोल धरोहर हैं। लेकिन अब इन स्थलों तक पहुंचने के लिए लगने वाला शुल्क आम लोगों की जेब पर भारी पड़ता नजर आ रहा है।
हाल ही में सामने आए शुल्क चार्ट के अनुसार कांगेरधारा जलप्रपात, कुटुमसर गुफा और कैलाश गुफा भ्रमण के लिए जीप सफारी शुल्क 1800 रुपये निर्धारित है। इसके अलावा 300 रुपये गाइड शुल्क, जैव विविधता शुल्क, पर्यटक शुल्क तथा अन्य शुल्क जोड़ने के बाद एक व्यक्ति के लिए कुल राशि 2150 रुपये तक पहुंच जाती है। छह व्यक्तियों के समूह के लिए भी कुल शुल्क 2400 रुपये निर्धारित है। फोटो और वीडियो कैमरे के लिए अलग से शुल्क लिया जाता है।
स्थानीय लोगों और पर्यटकों का कहना है कि प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को देखने के लिए इतनी अधिक राशि वसूलना उचित नहीं है। जहां एक ओर सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने और बस्तर को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर महंगे शुल्क आम परिवारों, छात्रों और मध्यम वर्ग के लोगों को इन स्थलों से दूर कर रहे हैं।

पर्यटकों का तर्क है कि यदि कोई चार या पांच सदस्यीय परिवार कांगेर वैली घूमने आता है तो उसे यात्रा, भोजन और अन्य खर्चों के अलावा हजारों रुपये सिर्फ प्रवेश और सफारी शुल्क पर खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में कई लोग इन स्थलों का भ्रमण करने का विचार ही छोड़ देते हैं।
वन विभाग के नियमों के अनुसार राष्ट्रीय उद्यान में अधिकृत गाइड के साथ प्रवेश अनिवार्य है और निर्धारित वाहन से ही भ्रमण कराया जाता है। विभाग का कहना है कि यह व्यवस्था पर्यटकों की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण और पर्यटन प्रबंधन के लिए आवश्यक है।
हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रकृति की गोद में बसे इन पर्यटन स्थलों
का आनंद लेना केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित होता जा रहा है? स्थानीय पर्यटन प्रेमियों का मानना है कि यदि शुल्क में कमी की जाए या स्थानीय नागरिकों, छात्रों तथा गरीब परिवारों के लिए विशेष रियायत दी जाए तो अधिक संख्या में लोग कांगेर वैली की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सकेंगे।
बस्तर की पहचान और गौरव माने जाने वाले कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान को पर्यटन विकास और जनसुलभता के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। अन्यथा “प्राकृतिक धरोहर सबके लिए” का उद्देश्य केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा और आम नागरिक प्रकृति की इस अनमोल विरासत को दूर से ही निहारने को मजबूर होंगे।
(नोट: यह लेख स्थल पर प्रदर्शित शुल्क सूची के आधार पर जनहित के मुद्दे को उठाता है। संबंधित विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जा सकता है।)



