राधे पटेल/ गरियाबंदगरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक से कृषि विभाग की गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। किसानों को वितरित की जाने वाली लाखों रुपये की कीटनाशक दवाइयां शासकीय भवन में लंबे समय तक बिना उचित देखरेख के रखे-रखे सड़ गईं। समय पर वितरण और सुरक्षित भंडारण नहीं होने के कारण यह पूरा स्टॉक अब अनुपयोगी हो चुका है, जिससे सरकारी संसाधनों की भारी बर्बादी सामने आई है।
मैनपुर ब्लॉक स्थित कृषि विभाग के एक शासकीय भवन में रखे कीटनाशक दवाइयों के स्टॉक की स्थिति बेहद खराब पाई गई। भवन की खिड़कियों में जंग लगी लोहे की सलाखों के पीछे सैकड़ों की संख्या में कीटनाशक दवाइयों की बोतलें और बोरियां ठूंसकर रखी गई थीं। मौके पर देखा गया कि कई बोतलों पर मोटी धूल जमी हुई है और उन पर जाले लग चुके हैं, जबकि कई बोरियां फट चुकी हैं।
लंबे समय तक धूप, नमी और उचित भंडारण के अभाव में दवाइयों की गुणवत्ता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। कई बोतलों के लेबल भी मिट चुके हैं, जिससे उनकी पहचान करना भी मुश्किल हो गया है। इस स्थिति को देखकर स्पष्ट होता है कि भंडारण व्यवस्था पूरी तरह लापरवाही का शिकार रही है।
जानकारी के अनुसार, ये वही कीटनाशक दवाइयां हैं जिन्हें किसानों को फसल को कीटों से बचाने के लिए समय-समय पर वितरित किया जाना था। लेकिन विभागीय लापरवाही के चलते इन दवाइयों का समय पर वितरण नहीं किया गया, जिसके कारण लाखों रुपये की सरकारी सामग्री बेकार हो गई।
स्थानीय किसानों ने इस मामले में गहरी नाराजगी जाहिर की है। किसानों का कहना है कि वे लंबे समय से कीटनाशक दवाइयों के लिए कृषि कार्यालय के चक्कर लगाते रहे, लेकिन हर बार उन्हें स्टॉक उपलब्ध नहीं होने की जानकारी देकर लौटा दिया गया। किसानों का आरोप है कि यदि उन्हें समय पर दवाइयां मिल जातीं, तो उनकी फसल को नुकसान से बचाया जा सकता था। किसानों ने इसे उनके साथ अन्याय और सरकारी व्यवस्था की विफलता बताया है।
इस पूरे मामले ने कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसानों को कीट प्रकोप से बचाने के लिए दवाइयों की तत्काल आवश्यकता थी, तब यह स्टॉक भवन में बंद क्यों रखा गया। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या वितरण प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की गई या फिर रिकॉर्ड में वितरण दिखाकर वास्तविक स्टॉक को नजरअंदाज किया गया।
नियमानुसार, एक्सपायरी तिथि वाली दवाइयों का समय पर वितरण किया जाना आवश्यक होता है और बची हुई दवाइयों का सुरक्षित नष्टीकरण भी अनिवार्य होता है। लेकिन मैनपुर ब्लॉक में इन नियमों की अनदेखी किए जाने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे विभागीय लापरवाही स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए संबंधित कृषि अधिकारी ने कहा है कि इस घटना की जानकारी विभाग के संज्ञान में आ गई है और पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि जांच के बाद यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
मैनपुर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में किसान पहले ही मौसम की अनिश्चितता और कीट प्रकोप जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में कृषि विभाग की इस तरह की लापरवाही किसानों की आर्थिक स्थिति को और अधिक प्रभावित कर सकती है। यह मामला न केवल सरकारी संसाधनों की बर्बादी का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं होने से किसानों को किस तरह नुकसान उठाना पड़ता है।
अब देखना यह होगा कि इस मामले में की जाने वाली जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है या फिर वास्तव में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही की पुनरावृत्ति न हो।


