राधे पटेल / गरियाबंद हृदयस्थल छत्तीसगढ़ जो अपने खेतों की सोंधी खुशबू और लोक परंपराओं के लिए जाना जाता है, ‘अक्ती तिहार‘ या अक्षय तृतीया के अवसर पर पूरी तरह से उत्सवमय हो जाता है। यह पर्व केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़िया संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का एक गहरा और सामंजस्यपूर्ण समागम है, जो पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं को जीवंत रखता है।
पुतरा-पुतरी विवाह: बचपन से ही परंपरा की सीख इस त्योहार की सबसे मनमोहक और अनूठी परंपराओं में से एक है ‘पुतरा-पुतरी विवाह’ या गुड्डे-गुड़ियों का विवाह। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का एक अविभाज्य अंग है। इस दिन, गांवों में छोटे बच्चे पूरी तन्मयता से मिट्टी के पुतरा-पुतरी तैयार करते हैं। वे बड़े उत्साह के साथ इस विवाह को वास्तविक विवाह की तरह ही आयोजित करते हैं।
इस रस्म में शादी, हल्दी, और बारात की सभी महत्वपूर्ण रस्में पूरी विधि-विधान से निभाई जाती हैं। यह परंपरा बच्चों के लिए केवल खेल नहीं है, बल्कि यह उन्हें विवाह की जिम्मेदारियों और पारिवारिक संबंधों का व्यावहारिक ज्ञान देने का एक अनूठा और प्राचीन तरीका है। इस माध्यम से, भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति और सामाजिक ढांचे की समझ बहुत कम उम्र में मिल जाती है।
पूर्वजों का तर्पण: नए मटके और मौसमी फलों की भेंट अक्ती तिहार का एक और महत्वपूर्ण और पवित्र पहलू पूर्वजों को याद करना और उन्हें नमन करना है। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन हमारे पूर्वज आशीर्वाद देने के लिए आते हैं। इस दिन, घरों में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजन किया जाता है।

एक महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि इस कार्यक्रम में एक नए मिट्टी के मटके का उपयोग किया जाता है। इस नए मटके में जल भरकर उसे पूर्वजों को अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही, मौसम के पहले नए फल जैसे कि ताज़े आम (Aam), चार (Char), और तेंदू (Tendu) भी श्रद्धापूर्वक अपने पूर्वजों को भेंट किए जाते हैं। घर के बड़े-बुजुर्ग धूप, दीप और गुगुल की सुगंध के साथ पूजन करते हैं और अपने पूर्वजों से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और कल्याण का आशीर्वाद मांगते हैं।
माटी पूजन और कृषि का शुभारंभ: धरती माता को नमन अक्ती तिहार का कृषि जीवन से भी गहरा नाता है। छत्तीसगढ़ के किसान इस दिन को ‘माटी पूजन दिवस’ के रूप में अत्यंत श्रद्धा से मनाते हैं। मान्यता है कि इसी दिन धरती माता में जीवन का बीज अंकुरित होने के लिए तैयार होता है। किसान अपने खेतों में जाकर सोंधी मिट्टी की पूजा करते हैं, नए बीजों को आशीर्वाद देते हैं और भगवान से अच्छी फसल की कामना करते हैं।
यह पर्व खरीफ फसल की तैयारी और हल-बैल की पूजा के साथ कृषि कार्य के विधिवत शुभारंभ का भी प्रतीक है। किसानों के लिए यह दिन एक नई शुरुआत, आशा और कृतज्ञता का दिन होता है, जब वे अपनी जीविका के मुख्य स्रोत, धरती माता और अपने पशुधन के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।
संस्कृति का जीवित प्रमाण इस प्रकार, अक्ती तिहार छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और कृषिगत जीवंतता का एक सुंदर और शक्तिशाली प्रमाण है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है, प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है और पूर्वजों के प्रति हमारे सम्मान को बनाए रखता है। छत्तीसगढ़ की यह परंपराएं न केवल राज्य की पहचान हैं, बल्कि ये मानव और प्रकृति के बीच के अटूट रिश्ते को भी दर्शाती हैं।



