छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत अब केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि धरातल पर उतरती हकीकत नजर आ रही है। केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित 31 मार्च 2026 की समयसीमा के अंतिम दिन, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एलान किया कि राज्य से सशस्त्र विद्रोह का दौर अब समाप्त हो चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा बलों की आक्रामकता और पुनर्वास नीति के संगम ने इस ‘लाल आतंक’ की जड़ों को उखाड़ फेंका है।
अमित शाह की ‘डेडलाइन’ और विजय शर्मा का एलान

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संकल्प लिया था कि 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सलवाद के दंश से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को हासिल करने में छत्तीसगढ़ की भूमिका सबसे चुनौतीपूर्ण थी। आज रायपुर में मीडिया से बात करते हुए विजय शर्मा ने कहा, “छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत” सुनिश्चित करने के लिए बस्तर की जनता और हमारे जांबाज जवानों ने जो बलिदान दिया है, वह व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्होंने दावा किया कि देशभर में माओवादी प्रभाव अब 99% तक समाप्त हो चुका है।
मुख्य आंकड़े: सफलता की कहानी (Key Points Box)
गृहमंत्री ने पिछले दो वर्षों के भीतर मिली सफलताओं का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया, जो यह साबित करता है कि नक्सलियों के पैर अब पूरी तरह उखड़ चुके हैं:
| विवरण | आंकड़े (लगभग) |
| आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली | ~3000 |
| गिरफ्तार हथियारबंद (Armed) कैडर | ~2000 |
| मुठभेड़ में मारे गए नक्सली | 500+ |
| पुनर्वास का लाभ पाने वाले परिवार | हजारों में |
| सुरक्षा कैंपों की नई स्थापना | 50+ (अंदरूनी इलाकों में) |
टेक्नोलॉजी और इंटेलिजेंस: ‘ऑपरेशन प्रहार’ की नई धार
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत करने में आधुनिक तकनीक ने गेम-चेंजर की भूमिका निभाई है। गृहमंत्री ने बताया कि अब सुरक्षा बल केवल पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहे, बल्कि:
ड्रोन सर्विलांस: घने जंगलों और पहाड़ों के ऊपर 24×7 नजर रखी जा रही है।
सटीक इंटेलिजेंस: आधुनिक संचार उपकरणों के जरिए नक्सलियों के मूवमेंट की रियल-टाइम जानकारी मिल रही है।
लोकल इनपुट: बस्तर के युवाओं को ‘बस्तर फाइटर्स’ और DRG में शामिल करने से सुरक्षा बलों को ‘अपनों के बीच’ से सटीक सूचनाएं मिल रही हैं।
पुनर्वास नीति: बंदूक छोड़ मुख्यधारा की ओर
गृहमंत्री विजय शर्मा ने जोर देकर कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल मारना नहीं, बल्कि भटके हुए लोगों को वापस लाना है।
“हमारी पुनर्वास नीति के तहत 3000 से अधिक नक्सलियों ने बंदूक छोड़ी है। उन्हें न केवल आर्थिक सहायता दी जा रही है, बल्कि व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) देकर समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जीने का मौका भी दिया जा रहा है।”
नारायणपुर, सुकमा और बीजापुर जैसे संवेदनशील जिलों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने ग्रामीणों के साथ मिलकर एक ऐसा माहौल तैयार किया, जहाँ अब नक्सलियों के लिए छिपने की जगह नहीं बची है।
क्या अभी भी कोई खतरा शेष है?
विजय शर्मा ने स्वीकार किया कि हालांकि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत लगभग हो चुका है, लेकिन कुछ छोटे और छिटपुट समूह अभी भी दूरस्थ पहाड़ों में छिपे हो सकते हैं।
सीमित प्रभाव: अब उनके पास न तो जनता का समर्थन है और न ही रसद की आपूर्ति।
सतर्कता: सुरक्षा बल अभी भी हाई-अलर्ट पर हैं ताकि कोई भी ‘Tactical Retreat’ या गुपचुप वापसी न कर सके।
एक नए बस्तर का उदय
31 मार्च 2026 की यह तारीख छत्तीसगढ़ के लिए एक नया सवेरा लेकर आई है। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत होने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती बस्तर के अंतिम गांव तक विकास की रोशनी पहुँचाना है। अमित शाह के विजन और विजय शर्मा के नेतृत्व में अब बस्तर “बंदूकों की गूंज” से नहीं, बल्कि “स्कूलों की घंटियों” और “बाजारों की रौनक” से पहचाना जाएगा।


