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    गरियाबंद

    परी उद्गम भाटीगढ़ में पारंपरिक रीति से संपन्न हुई ठाकुर देव जतरा, आस्था और कृषि विश्वास का अद्भुत संगम

    पारंपरिक रीति से हुई पूजा और बलि, महिलाओं की भागीदारी नहीं; समृद्ध फसल की कामना के साथ किसानों ने निभाई परंपरा
    Radheshyam PatelBy Radheshyam Patel29/03/2026
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    भाटीगढ़ (परी उद्गम): ग्रामीण परंपराओं और लोक आस्था का एक विशिष्ट उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब परी उद्गम भाटीगढ़ में ठाकुर देव जतरा का आयोजन पूरे पारंपरिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। यह आयोजन विशेष रूप से किसानों और ग्रामीण पुरुषों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं का पालन किया जाता है।

    इस जतरा में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण पुरुष शामिल हुए। सुबह से ही जतरा स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी और वातावरण पूरी तरह धार्मिक और पारंपरिक रंग में रंगा नजर आया। यह आयोजन अपने अनुशासन और परंपराओं के पालन के लिए भी जाना जाता है।

    जतरा के दौरान देवी-देवताओं का पूजन किया गया और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार बली (बलि) दी गई, जो इस अनुष्ठान का प्रमुख हिस्सा है। यह पूरी प्रक्रिया गांव के बुजुर्गों और परंपरागत पुजारियों की देखरेख में संपन्न हुई। यहां वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा नहीं है, बल्कि स्थानीय लोक-रीतियों और विश्वासों के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है।

    इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है धान के बीजों का वितरण, जिसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि ठाकुर देव जी से प्राप्त ये बीज उनके आशीर्वाद का प्रतीक होते हैं। किसान इन बीजों को अपने खेतों में बोते हैं और विश्वास करते हैं कि इससे फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है, उत्पादन में वृद्धि होती है और प्राकृतिक विपदाओं से भी सुरक्षा मिलती है।

    किसानों का कहना है कि यह जतरा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि उनकी खेती-किसानी और जीवन से जुड़ी गहरी आस्था का केंद्र है। कई किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इस परंपरा का पालन करने से उन्हें सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं।

    जतरा के दौरान सभी सहभागी सामूहिक रूप से ठाकुर देव की आराधना करते हैं और पूरे गांव की सुख-समृद्धि, समय पर वर्षा और अच्छी पैदावार की कामना करते हैं। यह आयोजन ग्रामीण समाज में एकता, अनुशासन और पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    जतरा स्थल पर पूरे दिन धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का सिलसिला चलता रहा। पारंपरिक वेशभूषा, लोक वातावरण और आपसी सहयोग ने इस आयोजन को और भी प्रभावशाली बना दिया। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस परंपरा के अनुसार महिलाओं की भागीदारी इस जतरा कार्यक्रम में नहीं होती, और इस नियम का पालन आज भी पूरी सख्ती और श्रद्धा के साथ किया जाता है।

    आधुनिकता के इस दौर में भी ऐसी परंपराएं ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं। ठाकुर देव जतरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह कृषि, परंपरा और सामाजिक संरचना के बीच गहरे संबंध को भी दर्शाता है।

     

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