WTI के 2017 सर्वे में 1,984 परिवार और 6,392 लोग दर्ज; 2017 के आंकड़ों से 2026 की आबादी करीब 6,900 होने का अनुमान, मौजूदा 15 लाख रुपए पैकेज से ही करोड़ों का गणित
मैनपुर। गरियाबंद जिले के उदंती क्षेत्र में वन संरक्षण और ग्रामीणों के संभावित पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर महत्वपूर्ण हो गया है। यहां सवाल सिर्फ गांवों के स्थानांतरण का नहीं है, बल्कि हजारों ग्रामीणों की जमीन, खेती, जंगल आधारित आजीविका, पशुधन और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण के लिए गांवों के स्वैच्छिक पुनर्वास की नीति लागू है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अनुसार Voluntary Village Relocation Programme का उद्देश्य एक ओर बाघ और अन्य वन्यजीवों के लिए निर्बाध आवास तैयार करना है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदायों को बेहतर विकास के अवसर उपलब्ध कराना है।
2017 के सर्वे में 17 गांवों की तस्वीर
आपके उपलब्ध WTI सर्वे के अनुसार उदंती क्षेत्र के 17 छोटे राजस्व गांव पांच ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आते हैं। सर्वे में 2007 और 2017 के बीच इन गांवों की आबादी तथा परिवारों में वृद्धि दर्ज की गई थी।
2017 में इन गांवों में कुल 1,984 परिवार और 6,392 लोग दर्ज किए गए थे। 2007 में परिवारों की संख्या 1,477 और आबादी 5,866 बताई गई थी।
इस हिसाब से दस साल में आबादी करीब 9 प्रतिशत और परिवारों की संख्या करीब 34 प्रतिशत बढ़ी।
यहां एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है—6,392 की संख्या 2017 के सर्वे की है। यह 2026 की सरकारी जनगणना का आंकड़ा नहीं है।
2026 की आबादी करीब 6,900 होने का अनुमान
यदि 2007 से 2017 के बीच दर्ज आबादी वृद्धि की औसत दर को केवल गणितीय आधार पर आगे बढ़ाया जाए तो 2026 में इन गांवों की आबादी लगभग 6,900 के आसपास बैठती है।
इसी तरह परिवारों की संख्या भी 2017 के 1,984 से बढ़कर करीब 2,500 से 2,600 के आसपास पहुंचने का अनुमान लगाया जा सकता है।
लेकिन यह अनुमान है, आधिकारिक वर्तमान जनसंख्या नहीं। वास्तविक स्थिति जानने के लिए ताजा पंचायतवार सर्वे या सरकारी रिकॉर्ड जरूरी होगा।
जमीन का आंकड़ा भी चौंकाने वाला
WTI के उपलब्ध 2017 सर्वे के अनुसार इन 17 गांवों में करीब 2,498.36 एकड़ पट्टा भूमि और 3,572.42 एकड़ गैर-पट्टा भूमि दर्ज की गई थी।
दोनों को जोड़ने पर कुल क्षेत्रफल करीब 6,070.78 एकड़ बैठता है।
हालांकि यहां सावधानी जरूरी है। पट्टा और गैर-पट्टा भूमि का कानूनी दर्जा एक जैसा नहीं होता। इसलिए पूरे 6,070.78 एकड़ को सीधे “मुआवजे के दायरे में आने वाली जमीन” कहना उचित नहीं होगा।
किस परिवार के पास कितना वैध भूमि अधिकार है, किसके पास वन अधिकार है और किस भूमि का रिकॉर्ड किस श्रेणी में आता है—यह अलग-अलग जांच का विषय होगा।
खेती की जमीन लगातार बंटती गई
सर्वे के अनुसार 2007 में औसत परिवार के पास करीब 4.23 एकड़ भूमि थी, जो 2017 तक घटकर करीब 2.70 एकड़ रह गई।
परिवारों की संख्या बढ़ने और भूमि के बंटवारे को इसके पीछे प्रमुख कारणों में माना गया है।
यानी यदि भविष्य में पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो सिर्फ मकान बनाकर परिवारों को दूसरी जगह भेज देना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी खेती और आजीविका का सवाल सबसे बड़ा मुद्दा होगा।
15 लाख रुपए प्रति परिवार का मौजूदा पैकेज
NTCA की वर्तमान आधिकारिक जानकारी में स्वैच्छिक गांव पुनर्वास के लिए केंद्रीय सहायता 15 लाख रुपए प्रति परिवार तक की गई है। NTCA के दस्तावेजों में इस सहायता को 2021 में 10 लाख से बढ़ाकर 15 लाख रुपए किए जाने का आदेश उपलब्ध है।
यदि केवल 2017 के सर्वे में दर्ज 1,984 परिवारों को आधार मानकर गणना करें तो—
1,984 × ₹15 लाख = ₹297.60 करोड़
यानी 2017 में दर्ज परिवारों के हिसाब से ही मौजूदा पैकेज पर करीब 298 करोड़ रुपए का गणित बनता है।
यदि केवल अनुमान के आधार पर 2026 में परिवारों की संख्या 2,500 से 2,600 मानी जाए तो—
2,500 × ₹15 लाख = ₹375 करोड़
और
2,600 × ₹15 लाख = ₹390 करोड़
इस तरह अनुमानित परिवारों के आधार पर पैकेज की राशि करीब 375 से 390 करोड़ रुपए के बीच हो सकती है।
लेकिन 298 या 390 करोड़ ही पूरा खर्च नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 15 लाख रुपए प्रति परिवार को पूरे पुनर्वास की अंतिम लागत नहीं माना जा सकता।
जमीन के अधिकार, पात्रता, पुनर्वास स्थल, आवास, कृषि भूमि, बुनियादी सुविधाएं और अन्य वैधानिक दावों की प्रक्रिया अलग हो सकती है।
इसलिए 297.60 करोड़ या 375-390 करोड़ रुपए की गणना को केवल मौजूदा प्रति परिवार पुनर्वास पैकेज के आधार पर प्रारंभिक अनुमान माना जाना चाहिए।
जंगल से सिर्फ लकड़ी नहीं, पूरी आजीविका जुड़ी है
उदंती क्षेत्र के ग्रामीणों की जिंदगी कृषि के साथ जंगल से भी जुड़ी हुई है। खेती, पशुपालन, लघु वनोपज और अन्य वन आधारित गतिविधियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं।
ऐसे में पुनर्वास होने पर सवाल सिर्फ मकान का नहीं होगा—
खेती की जमीन कहां मिलेगी?
पशुओं के लिए चराई की व्यवस्था कैसे होगी?
लघु वनोपज से होने वाली आय का विकल्प क्या होगा?
पेयजल, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधा मिलेगी या नहीं?
बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कैसी होगी?
ग्राम देवस्थल और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का क्या होगा?
यही वजह है कि पुनर्वास को केवल जमीन से जोड़कर देखना ग्रामीणों के वास्तविक नुकसान को छोटा करके देखने जैसा होगा।
संरक्षण के नजरिए से गांव हटाने का क्या फायदा?
वन संरक्षण की दृष्टि से स्वैच्छिक पुनर्वास का उद्देश्य जंगल के भीतर मानवीय दबाव कम करना है। गांवों के स्थानांतरण से खेती, चराई, ईंधन और अन्य गतिविधियों का दबाव कम होने पर वन्यजीवों के लिए अधिक निर्बाध क्षेत्र उपलब्ध कराया जा सकता है।
NTCA भी VVRP को स्थानीय समुदायों के विकास और वन्यजीवों के लिए inviolate space तैयार करने की दोहरी रणनीति के रूप में बताता है।
उदंती-सीतानदी क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है और यहां संरक्षण गतिविधियों के लिए केंद्र तथा राज्य स्तर पर योजनाएं संचालित हैं। 2025-26 के NTCA स्वीकृति दस्तावेज में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के लिए ₹464.77 लाख से अधिक का कुल APO और करीब ₹244.75 लाख केंद्रीय हिस्सा दर्ज है।
लेकिन सवाल यह भी—क्या सिर्फ गांव हटाने से जंगल बच जाएगा?
इसका जवाब आसान नहीं है।
यदि गांवों के पुनर्वास के बाद भी जंगल में अवैध कटाई, शिकार, आग, बाहरी अतिक्रमण और अन्य मानवीय दबाव बने रहते हैं तो केवल ग्रामीण बस्तियों को हटाने से संरक्षण का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं होगा।
इसलिए संभावित पुनर्वास के साथ वन सुरक्षा, habitat improvement, जलस्रोत संरक्षण और वन्यजीवों के आवास की निगरानी भी जरूरी होगी।
सबसे बड़ा सवाल—सहमति और अधिकारों का क्या?
यह पूरी प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।
NTCA की नीति में इसे Voluntary Village Relocation Programme कहा गया है। यानी पुनर्वास की प्रक्रिया को स्वैच्छिक आधार पर आगे बढ़ाया जाना है।
ऐसे में उदंती के किसी भी गांव के मामले में सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए—
- क्या ग्रामीणों की सहमति ली गई है?
- क्या उनके मान्यता प्राप्त वन एवं भूमि अधिकारों का निपटारा हुआ है?
- क्या पुनर्वास स्थल तय है?
- पात्र परिवारों की संख्या कितनी है?
- प्रत्येक परिवार को क्या-क्या मिलेगा?
- कृषि भूमि का क्या प्रावधान होगा?
- पुनर्वास स्थल पर स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली और पानी की व्यवस्था कौन करेगा?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पुनर्वास के बाद ग्रामीणों की आजीविका पहले से बेहतर होगी?
अभी सबसे जरूरी है ताजा सरकारी सर्वे
WTI के 2017 सर्वे के आंकड़े इस पूरे मुद्दे का एक महत्वपूर्ण आधार जरूर देते हैं, लेकिन 2026 की वास्तविक स्थिति जानने के लिए नया पंचायतवार सर्वे जरूरी है।
दस साल पुराने आंकड़ों से आज की आबादी और परिवारों का अनुमान निकाला जा सकता है, लेकिन उसे सरकारी वर्तमान आंकड़ा नहीं कहा जा सकता।
यही वजह है कि यदि उदंती में पुनर्वास की प्रक्रिया पर कोई नया प्रस्ताव या योजना तैयार हो रही है तो सबसे पहले वर्तमान परिवारों, आबादी, भूमि अधिकारों और पात्रता का आधिकारिक सर्वे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
जंगल की जमीन बनाम ग्रामीणों का भविष्य नहीं, दोनों का समाधान जरूरी
उदंती के 17 गांवों का मामला केवल वन विभाग और ग्रामीणों के बीच का मुद्दा नहीं है। यह वन्यजीव संरक्षण, आदिवासी अधिकार, जमीन, आजीविका और करोड़ों रुपए के पुनर्वास पैकेज से जुड़ा विषय है।
WTI के 2017 के आंकड़ों को आधार मानें तो उस समय 1,984 परिवारों में 6,392 लोग रहते थे। 2017 के बाद समान वृद्धि दर मानने पर 2026 की आबादी करीब 6,900 और परिवारों की संख्या करीब 2,500-2,600 होने का अनुमान निकलता है।
मौजूदा 15 लाख रुपए प्रति परिवार के पैकेज पर 2017 के परिवारों के लिए करीब ₹297.60 करोड़ और अनुमानित 2,500-2,600 परिवारों के लिए करीब ₹375-390 करोड़ का प्रारंभिक गणित सामने आता है।
लेकिन असली सवाल रकम से भी बड़ा है—
क्या जंगल को बचाने के नाम पर ग्रामीणों का जीवन बदलेगा, या ऐसा पुनर्वास मॉडल तैयार होगा जिसमें जंगल भी बचे और गांवों के लोगों का भविष्य भी सुरक्षित रहे?
उदंती में अब किसी भी संभावित पुनर्वास से पहले यही सबसे बड़ा सवाल है।




