मैनपुर/गरियाबंद। उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व द्वारा दूरस्थ वन क्षेत्रों में रहने वाली किशोरियों के स्वास्थ्य और स्वच्छता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। इस योजना के तहत गरियाबंद और धमतरी जिले के वनांचल क्षेत्रों में निवासरत 1325 स्कूली छात्राओं को एक वर्ष तक निःशुल्क बायो-डीग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएंगे।
यह पहल उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व द्वारा Earth Brigade Foundation एवं Astitva Wellness के सहयोग से संचालित की जा रही है। वहीं, खोज एवं जन जागृति एनजीओ द्वारा जमीनी स्तर पर कार्यक्रम के क्रियान्वयन में सहयोग प्रदान किया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार यह कार्यक्रम गरियाबंद एवं धमतरी जिलों के वन क्षेत्रों में स्थित अमाड, भुतबेड़ा, जांगड़ा, कुल्हाड़ीघाट, भालूडिग्गी, कोयवा, साहेबिनकच्छार, नागेश, तौरेंगा, खल्लारी, फरसगांव, रिसगांव, करही, ठेन्ही सहित आसपास के कई गांवों में संचालित किया जाएगा। इस पहल का मुख्य उद्देश्य किशोरियों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन को बेहतर बनाना, विद्यालय छोड़ने की दर को कम करना तथा बालिकाओं एवं महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
कार्यक्रम के प्रभावी संचालन के लिए 28 और 29 मई 2026 को मैनपुर में दो दिवसीय ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स (ToT) कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में 35 महिलाओं ने भाग लिया। चयनित महिला प्रतिनिधियों एवं सामुदायिक कार्यकर्ताओं को “मासिक धर्म स्वास्थ्य चैम्पियन” अथवा “पीरियड सखी” के रूप में प्रशिक्षित किया गया, जो आगे गांवों और विद्यालयों में स्वास्थ्य एवं स्वच्छता संबंधी जागरूकता गतिविधियों का संचालन करेंगी।
विशेष बात यह है कि इस योजना के अंतर्गत वितरित किए जाने वाले सैनिटरी पैड पूरी तरह जैव-अवक्रमणीय (बायो-डीग्रेडेबल), प्लास्टिक मुक्त एवं हानिकारक रसायनों से रहित होंगे। इससे महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा के साथ-साथ वन क्षेत्रों में प्लास्टिक अपशिष्ट और पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में भी मदद मिलेगी।
उल्लेखनीय है कि उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व इससे पहले भी Earth Brigade Foundation के सहयोग से कई सामुदायिक और संरक्षण आधारित कार्यक्रमों का सफल संचालन कर चुका है। इनमें सौर पंपों के माध्यम से जंगलों में जल उपलब्धता बढ़ाकर मानव-वन्यप्राणी संघर्ष को कम करना, दूरस्थ वन ग्रामों में सौर लैम्प और जल शोधक वितरण जैसी पहलें शामिल हैं।
वन अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार की योजनाएं यह साबित करती हैं कि वन्यजीव संरक्षण और सामुदायिक कल्याण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। इससे वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार होने के साथ-साथ सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।



