करोड़ों की सड़क पर पहली बरसात का ‘गुणवत्ता टेस्ट’! डामर की परत उखड़ी, निर्माणाधीन पुल भी बहा
गरियाबंद। जिस सड़क को आदिवासी और पहुंचविहीन गांवों के लिए विकास की नई राह बनना था, वह पहली ही बरसात में सवालों की सड़क बन गई। लोकार्पण से पहले ही सड़क की परत उखड़ गई और निर्माणाधीन पुल का हिस्सा तेज बहाव में बह गया। अब ग्रामीणों के बीच सीधा सवाल है—जब सड़क अभी जनता को समर्पित भी नहीं हुई, तो पहली बारिश ने इसकी गुणवत्ता की ऐसी परीक्षा कैसे ले ली?
मामला जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर कमर भौंदी से कमारपारा तक बन रहे जनमन सड़क मार्ग का है। पीएम-जनमन के तहत बनाए जा रहे इस मार्ग में सड़क के साथ करीब नौ नालों में पुल और रपटा निर्माण भी शामिल बताया जा रहा है। योजना का मकसद दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों को बुनियादी सुविधाओं और सड़क संपर्क से जोड़ना है।
पहली बारिश में ही खुल गई निर्माण की परत?
ग्रामीणों के मुताबिक सड़क का निर्माण लगभग पूर्णता की ओर था। लेकिन मानसून की पहली तेज बारिश ने कई जगह सड़क की ऊपरी परत को उधेड़ दिया। जगह-जगह डामर और गिट्टी निकलने की स्थिति दिखाई दे रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क पर डामरीकरण की परत बेहद पतली रखी गई है। कुछ स्थानों पर यह करीब एक इंच के आसपास दिखाई दे रही है। हालांकि सड़क की वास्तविक मोटाई निर्धारित मापदंड के अनुरूप है या नहीं, इसका फैसला तकनीकी परीक्षण के बाद ही हो सकता है। यही वजह है कि ग्रामीण अब सड़क की मोटाई और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच की मांग कर रहे हैं।
पुल बना नहीं, बारिश ने बहा दिया!
मामले में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात निर्माणाधीन पुल को लेकर सामने आई है। तेज बारिश के पानी के बहाव में पुल का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर बह गया। इसके बाद अब उसी हिस्से की मरम्मत शुरू किए जाने की बात कही जा रही है।
यहीं से सवाल और तीखा हो जाता है—जिस पुल को अभी लोकार्पण के बाद ग्रामीणों के हवाले किया जाना था, वह लोकार्पण से पहले ही मरम्मत के भरोसे क्यों पहुंच गया?
अगर निर्माण में सब कुछ निर्धारित मानकों के मुताबिक हुआ है तो पहली बारिश में ही पुल को नुकसान पहुंचने की वजह क्या रही? और अगर प्राकृतिक जल बहाव ही इसकी वजह है, तो क्या निर्माण के दौरान जल निकासी और संरचनात्मक सुरक्षा का पर्याप्त आकलन किया गया था?
सड़क जनता के लिए बनी या पहली बारिश के लिए?
पीएम-जनमन जैसी योजना का उद्देश्य उन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना है, जहां आज भी आवागमन बड़ी चुनौती है। ऐसे इलाकों में सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती—यह अस्पताल तक पहुंच, बच्चों की पढ़ाई, बाजार तक पहुंच और सरकारी सेवाओं से जुड़ने का रास्ता होती है।
ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई जा रही सड़क अगर पहली बरसात में ही जगह-जगह जवाब देने लगे तो मामला महज सड़क टूटने तक सीमित नहीं रहता। सवाल सरकारी धन, निर्माण की निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण की पूरी व्यवस्था पर खड़ा होता है।
‘काम पूरा’ बताने से पहले गुणवत्ता की जांच हुई थी?
निर्माण एजेंसी को सड़क और पुल की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना चाहिए था। उनका सवाल है कि यदि निर्माण कार्य अंतिम चरण में था तो क्या विभागीय अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर सड़क की मोटाई, डामर की गुणवत्ता, बेस और पुल की संरचना की जांच की थी?
कागज पर सड़क मजबूत हो सकती है, लेकिन पहली बारिश ने अगर जमीन पर उसकी परत उधेड़ दी तो सवाल उठना लाजिमी है।
अब जरूरत केवल क्षतिग्रस्त सड़क की मरम्मत कराने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि नुकसान की असली वजह क्या है।
ग्रामीणों ने मांगी जांच, कहा- सिर्फ लीपापोती नहीं चलेगी
ग्रामीणों ने पूरे मार्ग की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि सड़क की मोटाई की मौके पर जांच की जाए, इस्तेमाल की गई निर्माण सामग्री के नमूने लिए जाएं और पुल के क्षतिग्रस्त हिस्से की भी तकनीकी जांच हो।
ग्रामीणों की मांग है कि यदि जांच में निर्माण एजेंसी की लापरवाही या तकनीकी खामी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जाए। केवल टूटे हिस्से पर दोबारा डामर या निर्माण सामग्री डालकर मामले को खत्म करने के बजाय गुणवत्ता की जड़ तक पहुंचना जरूरी है।
अब विभाग के सामने तीन बड़े सवाल
पहला— पहली बारिश में सड़क की परत क्यों उखड़ी?
दूसरा— निर्माणाधीन पुल तेज बहाव में क्यों बहा?
तीसरा— लोकार्पण से पहले ही मरम्मत की नौबत क्यों आई?
इन सवालों का जवाब तकनीकी जांच से ही सामने आ सकता है। गरियाबंद जिला प्रशासन की निर्देशिका में संबंधित ग्रामीण सड़क कार्यों के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के कार्यपालन अभियंता का कार्यालय भी दर्ज है, इसलिए मामले में विभागीय स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग और महत्वपूर्ण हो जाती है।
फिलहाल पहली बारिश ने सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर सवालों की ऐसी परत जरूर खोल दी है, जिसे केवल मरम्मत के डामर से ढका नहीं जा सकता। अब देखना यह है कि विभाग इन सवालों का जवाब मौके की तकनीकी जांच से देता है या फिर सड़क की तरह सवाल भी बारिश के पानी में बह जाते हैं।


