प्रमुख बिंदु:
सीएम विष्णुदेव साय के निर्देश- सभी जिलों में तत्काल सर्वे कर शासन को भेजें नुकसान की रिपोर्ट।
महज 5% धान की कटाई- खेतों में बिछी (गिरी हुई) फसलें बीमा के दायरे से बाहर होने से किसानों में हाहाकार।
कृषि विभाग का एक्शन- राजस्व अमले के साथ मिलकर ‘क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट’ से होगा वास्तविक सर्वे।
गरियाबंद | छत्तीसगढ़ सहित गरियाबंद जिले में बीते दिनों आए ‘अर्नव’ तूफान और भारी बारिश ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस प्राकृतिक आपदा का सबसे बड़ा खामियाजा अंचल के अन्नदाताओं को भुगतना पड़ा है। खेतों में लहलहाती खरीफ की फसलें पूरी तरह से तबाह हो गई हैं। बैंकों से कर्ज लेकर खेती करने वाले प्रदेश भर के किसान एक बार फिर कर्ज के भारी बोझ तले दबते नजर आ रहे हैं और उनके माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंच गई हैं।
लगातार तीन चक्रवात, हफ्ते भर पानी में डूबी रही फसलें
ज्यादातर किसानों की खरीफ फसल पूरी तरह से बरसात पर निर्भर रहती है। इस साल लगातार तीन बार आए चक्रवात और अतिवृष्टि ने भारी तबाही मचाई है। कई इलाकों में नदी-नाले उफान पर होने से हफ्ते भर तक फसलें पानी में डूबी रहीं, जिससे वे सड़ने लगी थीं। अब ‘अर्नव’ तूफान ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। तूफान और भारी बारिश के कारण सबसे ज्यादा धान और मक्के की फसल को नुकसान पहुंचा है। खेतों में पककर तैयार खड़ी फसलें तेज हवा और पानी की मार से गिर (बिछ) चुकी हैं। स्थिति यह है कि क्षेत्र में अब तक महज 5% फसलों की ही कटाई हो पाई थी और बाकी तैयार फसलें बर्बादी की कगार पर हैं।
सीएम ने दिए सर्वे और मुआवजे के निर्देश
किसानों की इस दयनीय स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सख्त कदम उठाए हैं। सीएम ने प्रदेश के सभी जिलों के संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे तत्काल अपने-अपने क्षेत्रों में बारिश और तूफान से हुए नुकसान का सर्वे करें और शासन को इसकी विस्तृत रिपोर्ट भेजें। शासन की मंशा है कि प्रभावित किसानों को जल्द से जल्द मुआवजे की प्रक्रिया पूरी कर राहत राशि प्रदान की जाए। अब किसानों को भी अपनी आर्थिक स्थिति सुधरने के लिए बीमा कंपनियों और सरकारी मुआवजे का ही सहारा है।
बीमा कंपनी की अजीब शर्तों ने उड़ाई नींद
सरकार के निर्देशों के बीच फसल बीमा कंपनियों की शर्तों ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। गरियाबंद जिले के प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के प्रतिनिधि केदार साहू ने साफ तौर पर कहा है कि बीमा राशि के क्राइटेरिया (मापदंड) में केवल ‘कटे हुए धान’ की फसल और ‘खड़े’ मक्का, सोयाबीन व मूंगफली की फसलों को ही शामिल किया गया है।
उनका कहना है कि जो धान की फसलें खेतों में बिछ गई हैं या सो गई हैं, वे बीमा के क्राइटेरिया में नहीं आतीं, इसलिए उनका क्लेम नहीं मिलेगा। यह नियम किसानों के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि अभी 95% फसल की कटाई बाकी है और तूफान के कारण ज्यादातर धान की खड़ी फसल खेतों में गिर चुकी है।
‘क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट’ से होगा सर्वे: कृषि विभाग
बीमा कंपनी के इस पेंच और किसानों की बढ़ती चिंताओं के बीच गरियाबंद के उप संचालक कृषि (DDA) चंदन रॉय ने राहत भरा बयान दिया है। उन्होंने बताया कि इस पूरे मामले को लेकर जिले में एक आपात बैठक आयोजित की गई है। इसमें सभी संबंधित अधिकारियों और फसल बीमा कंपनी के कर्मचारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं।
कृषि उप संचालक ने स्पष्ट किया कि जिन-जिन गांवों में फसलें ज्यादा प्रभावित हुई हैं, वहां कृषि विभाग और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम द्वारा ‘क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट’ (Crop Cutting Experiment) के जरिए वैज्ञानिक सर्वे किया जाएगा। इसी सर्वे के आधार पर प्रभावित गांवों के किसानों के लिए मुआवजे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी, ताकि किसी भी किसान के साथ अन्याय न हो।
अब देखना यह होगा कि सरकार किस तरह से किसानों को राहत देती है या प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी कृषि एवं राजस्व विभाग द्वारा बीमा कंपनियों के पक्ष में रिपोर्ट तैयार कर सरकार और किसानों की आंखों में धूल झोंका जाता है।


