गरियाबंद जिले से देवभोग होते हुए ओडिशा को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-130C) इन दिनों सुरक्षित सफर की बजाय हादसों का सबब बनता जा रहा है। बारिश शुरू होते ही सड़क के दोनों किनारों पर 2-2 मीटर तक गहरे कटाव और विशाल गड्ढे बन गए हैं। कई जगहों पर सड़क का किनारा पूरी तरह धंस चुका है। यह राजमार्ग छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है, जहां जरा सी चूक एक गंभीर सड़क दुर्घटना में बदल सकती है।
रात के अंधेरे में बढ़ जाता है खतरा स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में इस मार्ग पर कई दर्दनाक हादसे हो चुके हैं। बारिश के मौसम में सड़क और किनारे के गड्ढों के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। रात के समय यह स्थिति और भी भयानक हो जाती है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि सड़क सुरक्षा को लेकर न तो राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) विभाग गंभीर है और न ही स्थानीय प्रशासन कोई ठोस पहल कर रहा है।
विभागों के अपने-अपने तर्क
कोर एरिया के कारण अनुमति में देरी: NH विभाग NH-130C के इंजीनियर मनीष शर्मा ने बताया कि सड़क किनारे दो-दो मीटर पिचिंग कराने के लिए वन विभाग और भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। संबंधित क्षेत्र ‘कोर एरिया’ में आने के कारण विभागीय कार्यों की अनुमति में बाधाएं आ रही हैं। उन्होंने बताया कि करीब दो-तीन साल पहले इस सड़क को डबल लेन करने का प्रस्ताव भी भेजा गया था, जिसे अब तक स्वीकृति नहीं मिल सकी है। अनुमति मिलते ही काम शुरू किया जाएगा।
सुरक्षा कार्यों पर कोई रोक नहीं: वन विभाग दूसरी ओर, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप संचालक वरुण जैन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कोर एरिया में रात के समय वाहनों का संचालन प्रतिबंधित है, लेकिन सड़क सुरक्षा से जुड़े कार्यों के लिए वन विभाग की ओर से कोई आपत्ति नहीं है। जहां कटाव हुआ है, वहां मरम्मत की जा सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि केवल मिट्टी डालने के बजाय पत्थरों से मजबूत पिचिंग कर किनारों को सुरक्षित बनाया जाना चाहिए, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कम हो।
तो आखिर जवाबदेही किसकी? इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वन विभाग मरम्मत कार्यों पर कोई आपत्ति नहीं जता रहा, तो NH विभाग वर्षों से किस अनुमति का इंतजार कर रहा है? राहगीरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? हर बारिश के साथ गहराते गड्ढे इस बात का अलार्म हैं कि अब कागजी प्रस्तावों से नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस कार्रवाई से ही लोगों की जान बचाई जा सकती है।





