राधे पटेल / गरियाबंद चौंकाने वाला मामला गरियाबंद से सामने आया है, जहां राजिम विधानसभा से लेकर बिंद्रानवागढ़ तक राजनीति और भ्रष्टाचार का एक काला सच गलियों में घूम रहा है। जिस ‘मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान’ का मकसद गरीब, दबे-कुचले, बीमार और अत्यंत लाचार लोगों को आर्थिक मदद देना था, वह अब सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं का “बोनस” बनकर रह गया है।

राजधानी से जो मदद गरीबों के लिए चली थी, वह राजिम पहुंचते-पहुंचते भाजपा पार्टी के पदाधिकारियों की जेब में समा गई। जब अनुदान की गुप्त लिस्ट लीक हुई और शहर की गलियों में पहुंची, तो आम जनता हैरान रह गई। इस लिस्ट में ऐसे-ऐसे नाम शामिल हैं जो समाज के संपन्न वर्ग से आते हैं।
सिस्टम की नाकामी और अपनों को रेवड़ी: नियमों के मुताबिक, स्वेच्छानुदान सिर्फ उस व्यक्ति को मिलता है जो अत्यंत बेबस हो और जिसे तत्काल इलाज या मदद के लिए रुपयों की जरूरत हो। लेकिन लीक हुई लिस्ट की कहानी कुछ और ही बयां कर रही है। इसमें इनकम टैक्स भरने वालों से लेकर गांव के दाऊ, भाजपा के मंडल अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, पार्षद, पूर्व सरपंच और यहां तक कि बूथ अध्यक्षों तक के नाम शामिल हैं।

कथित तौर पर बड़े पदाधिकारियों को 10-10 हजार और बूथ अध्यक्षों को 5-5 हजार रुपये बांटे गए हैं। हद तो तब हो गई जब सरकारी नौकरी करने वाले पतियों की पत्नियों को और कई जगह पति-पत्नी दोनों को यह सरकारी खैरात बांट दी गई।
पार्टी के अंदर भी भेदभाव से फूटा गुस्सा: इस बंदरबांट में सिर्फ जनता ही नहीं ठगी गई, बल्कि लिस्ट बनाने वाले नेताओं ने अपने ही कार्यकर्ताओं के साथ भी खेल कर दिया। अपने परिवार और चहेतों को लिस्ट में भर दिया गया, जबकि बिंद्रानवागढ़ विधानसभा के कई भाजपा कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका सीधा सवाल है कि जब झंडा वो भी उठा रहे हैं, तो मुख्यमंत्री जी के नाम पर आए इस फंड में उनके साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों?
हालांकि, इस राजनीतिक कीचड़ के बीच कुछ गैरतमंद कार्यकर्ताओं ने अपनी मर्यादा और सेवाभाव को जिंदा रखते हुए इस राशि को लेने से साफ इंकार कर दिया है, लेकिन ऐसे लोगों की गिनती उंगलियों पर ही है। यह पूरा मामला प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था, नैतिकता और सेवाभाव पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।


