गरियाबंद । जिले के दूरस्थ और आदिवासी बहुल क्षेत्र ग्राम पंचायत कोपेकासा के आश्रित ग्राम सुखरीडबरी से मानव संवेदनाओं को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक बुजुर्ग मां अपने 35 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे की देखभाल के लिए संघर्ष कर रही है। वर्षों से बीमारी से जूझ रहे बेटे और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित परिवार की स्थिति प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर रही है।
ग्राम सुखरीडबरी निवासी अग्नि बाई भुंजिया का कहना है कि उनका बेटा महेश भुंजिया बचपन में गंभीर मलेरिया की चपेट में आ गया था। उस समय उचित इलाज नहीं मिल पाने के कारण उसकी मानसिक स्थिति प्रभावित हो गई। तब से लेकर आज तक वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है और सामान्य जीवन नहीं जी पा रहा है।
बेटे की सुरक्षा के लिए रस्सी से बांधने को मजबूर मां
बुजुर्ग अग्नि बाई के सामने सबसे बड़ी चुनौती बेटे की सुरक्षा है। परिवार की आजीविका चलाने और दैनिक जरूरतों की व्यवस्था के लिए जब उन्हें घर से बाहर जाना पड़ता है, तब मजबूरी में वह अपने बेटे महेश को घर के बरामदे में रस्सी से बांधकर छोड़ती हैं। उनका कहना है कि ऐसा नहीं करने पर वह कहीं भटक सकता है या किसी दुर्घटना का शिकार हो सकता है।
यह स्थिति न केवल एक परिवार की पीड़ा को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की पहुंच पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
आधार कार्ड नहीं, इसलिए नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ
विशेष पिछड़ी जनजाति भुंजिया समुदाय से संबंधित यह परिवार आज भी कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। परिजनों का आरोप है कि महेश भुंजिया का आधार कार्ड अब तक नहीं बन पाया है। आधार कार्ड नहीं होने के कारण उसे न तो सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिल रही है और न ही अन्य शासकीय योजनाओं का लाभ मिल पा रहा है। यहां तक कि राशन जैसी आवश्यक सुविधाओं का लाभ लेने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
आश्वासन मिले, समाधान नहीं
ग्रामीणों के अनुसार कुछ समय पहले प्रशासनिक अधिकारियों ने गांव पहुंचकर परिवार की स्थिति का जायजा लिया था और आवश्यक सहायता देने का आश्वासन भी दिया था। लेकिन इसके बाद कोई ठोस पहल नजर नहीं आई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते आधार कार्ड, पेंशन और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं उपलब्ध करा दी जातीं तो परिवार की परेशानियां काफी हद तक कम हो सकती थीं।
ग्रामीण धरम सिंह भुंजिया ने बताया कि यह परिवार लंबे समय से कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहा है और प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप कर सहायता प्रदान करनी चाहिए।
उठ रहे कई सवाल
एक ओर सरकार विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान और कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर सुखरीडबरी का यह परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं और सरकारी सहायता के लिए संघर्ष कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर मानसिक रूप से अस्वस्थ महेश भुंजिया का आधार कार्ड अब तक क्यों नहीं बन पाया और उसे सरकारी योजनाओं का लाभ कब तक मिलेगा।
फिलहाल अग्नि बाई अपने बेटे के बेहतर भविष्य और प्रशासनिक सहायता की उम्मीद लगाए बैठी हैं। अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इस संवेदनशील मामले में कब तक पहल करते हैं और इस परिवार को राहत मिल पाती है या नहीं।



बेटे की सुरक्षा के लिए रस्सी से बांधने को मजबूर मां