रात 2 बजे तैरेगा–इंदागांव बैरियर पर हुई घटना ने खोली आपातकालीन सुविधाओं की पोल; 11 घंटे के प्रतिबंध के बीच यात्रियों के लिए न पानी, न शौचालय और न सुरक्षित प्रतीक्षालय
मैनपुर। वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों और आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों के बीच संतुलन कितना जरूरी है, इसकी गंभीर तस्वीर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में सामने आई है। मंगलवार-बुधवार की दरम्यानी रात करीब 2 बजे तैरेगा–इंदागांव बैरियर पर रोकी गई यात्री बस में सवार एक गर्भवती महिला को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। अस्पताल पहुंचने की समुचित व्यवस्था और तत्काल चिकित्सा सहायता नहीं मिलने के कारण महिला को अंधेरे में खुले मैदान में ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। बाद में महतारी एक्सप्रेस की मदद से जच्चा और बच्चा को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मैनपुर पहुंचाया गया। राहत की बात है कि दोनों सुरक्षित बताए जा रहे हैं।

यह घटना सिर्फ एक महिला के प्रसव तक सीमित नहीं है, बल्कि टाइगर रिजर्व क्षेत्र में रात्रिकालीन आवागमन प्रतिबंध के दौरान यात्रियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रात 2 बजे शुरू हुई प्रसव पीड़ा, मोबाइल की रोशनी में कराना पड़ा प्रसव
जानकारी के अनुसार, खड़गांव से देवभोग की ओर जा रही यात्री बस में ग्राम रेसला, तहसील कुआं निवासी कमार जनजाति की महिला संतोषी सोरी भी सवार थीं। मंगलवार-बुधवार की दरम्यानी रात करीब 2 बजे तैरेगा और इंदागांव बैरियर के बीच अचानक उन्हें तेज प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। महिला की स्थिति बिगड़ती देख बस में मौजूद यात्रियों और परिचालक ने मदद का प्रयास किया।

लेकिन रात का समय, जंगल का सुनसान इलाका और आसपास तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गई। आखिरकार मोबाइल की रोशनी में खुले मैदान में ही महिला का प्रसव कराना पड़ा। इस दौरान बस में मौजूद लोगों ने मानवीय संवेदनशीलता दिखाते हुए सहयोग किया और महतारी एक्सप्रेस को सूचना दी। एंबुलेंस के पहुंचने के बाद जच्चा-बच्चा को मैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 11 घंटे का प्रतिबंध
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रात 7 बजे से सुबह 6 बजे तक वाहनों के आवागमन पर प्रतिबंध लगाया गया है। यानी इस मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों को करीब 11 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है।
वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इसके साथ यात्रियों की सुरक्षा और आवश्यक सुविधाओं की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस मार्ग से अमलीपदर, मैनपुर और देवभोग सहित वनांचल के अनेक गांवों के ग्रामीण आवागमन करते हैं। इनमें गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे और गंभीर मरीज भी शामिल रहते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब यात्रियों को 11 घंटे तक बैरियर पर रुकना पड़ता है, तो दोनों नाकों पर पेयजल, शौचालय, भोजन, रोशनी और सुरक्षित विश्राम की व्यवस्था क्यों नहीं है?
बाघों की सुरक्षा, लेकिन यात्रियों की सुविधा का ठिकाना कहां?
स्थानीय लोगों का कहना है कि वन विभाग ने रात्रिकालीन आवागमन रोकने के लिए बैरियर तो स्थापित कर दिए हैं, लेकिन वहां रुकने वाले यात्रियों की बुनियादी जरूरतों को लेकर पर्याप्त इंतजाम नजर नहीं आते। किसी यात्री की अचानक तबीयत बिगड़ जाए, गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाए या कोई दुर्घटना हो जाए तो तत्काल अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था बड़ी चुनौती बन जाती है।
ऐसे में दोनों बैरियरों पर प्राथमिक चिकित्सा केंद्र अथवा आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा, 24 घंटे एंबुलेंस, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और महिलाओं व बुजुर्गों के लिए सुरक्षित प्रतीक्षालय की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके साथ भोजन, पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध कराना जरूरी है।
गंभीर आपातकालीन परिस्थितियों में वन विभाग की अनुमति से वाहनों को तत्काल आवागमन की सुविधा देने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल भी बनाया जाना चाहिए, ताकि नियमों का पालन करते हुए किसी की जान जोखिम में न पड़े।
प्रतिबंध के समय और क्षेत्र की समीक्षा की भी उठी मांग
इस घटना के बाद वन्यजीव संरक्षण और जनसुविधाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की मांग तेज हो सकती है। वन्यजीवों की आवाजाही के वैज्ञानिक आंकड़ों और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर प्रतिबंध के समय तथा प्रभावित क्षेत्र की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।
स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठ रही है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन-प्रशासन के साथ न्यायालय के समक्ष भी प्रतिबंध की व्यवस्था और उसके मानवीय प्रभावों पर पुनर्विचार का विषय रखा जाए। हालांकि, वन्यजीव संरक्षण के उद्देश्य को प्रभावित किए बिना यात्रियों के लिए सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प तैयार करना जरूरी होगा।
अब व्यवस्था से सीधे सवाल
क्या वनांचल के लोगों को आपातकालीन इलाज के बजाय जंगल में ही चिकित्सा संकट का सामना करना पड़ेगा?
बाघों की सुरक्षा के लिए प्रतिबंध है, तो बैरियर पर फंसे यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या वन विभाग ने कभी रातभर बैरियर पर रुके यात्रियों की वास्तविक परेशानियों का आकलन किया है?
दोनों बैरियरों पर 24 घंटे एंबुलेंस और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था कब होगी?
क्या जिला प्रशासन, वन विभाग और स्वास्थ्य विभाग मिलकर स्थायी आपातकालीन व्यवस्था तैयार करेंगे?
जंगल में बाघ भी सुरक्षित रहें और इंसान भी अपने घर पहुंचें
यह लड़ाई वन्यजीवों और इंसानों के बीच नहीं है। बाघों का संरक्षण जरूरी है, जंगल का प्राकृतिक आवास बचाना भी जरूरी है, लेकिन वनांचल में रहने वाले नागरिकों का जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवागमन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि जंगल में बाघ बेखौफ विचरण करें, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहे और आम नागरिकों को अस्पताल पहुंचने या अपने घर लौटने के लिए सुबह होने तक बैरियर पर असहाय होकर इंतजार न करना पड़े।
जंगल बुक की कहानी पर्दे पर मनोरंजक लग सकती है, लेकिन वास्तविक जंगल में किसी गर्भवती महिला को मोबाइल की रोशनी में बच्चे को जन्म देना पड़े तो यह मनोरंजन नहीं, व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर सवाल है।
अब देखना यह है कि इस घटना के बाद जिम्मेदार विभाग सबक लेकर दोनों बैरियरों पर आपातकालीन सुविधाएं विकसित करते हैं या फिर वनांचल के लोगों को अगली ऐसी परिस्थिति में भी रातभर सुबह होने का इंतजार करना पड़ेगा।


