वायरल फीवर के बीच ग्रामीण परेशान: सरकारी अस्पताल की समय-सारिणी और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति पर उठ रहे सवाल
मैनपुर। विकासखंड मैनपुर समेत आसपास के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में इन दिनों वायरल फीवर और बुखार से संबंधित मरीजों की संख्या बढ़ने के बीच सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की समय-सारिणी को लेकर लोगों की परेशानी सामने आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि मैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) सहित क्षेत्र के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में निर्धारित समय के बाद तत्काल इलाज की सुविधा नहीं मिलने पर मरीजों को निजी और कई बार बिना वैध चिकित्सकीय योग्यता वाले कथित झोलाछाप डॉक्टरों का सहारा लेना पड़ रहा है।
मैनपुर का CHC जिला प्रशासन की वेबसाइट पर शासकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में दर्ज है।
दोपहर 1 बजे के बाद मरीजों की बढ़ती परेशानी
ग्रामीणों के अनुसार सरकारी अस्पतालों में OPD की समय-सारिणी को लेकर लगातार दिक्कतें सामने आ रही हैं। क्षेत्र में बताई जा रही समय-सारिणी के अनुसार सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक तथा शाम को 4 बजे से 5:30 बजे तक OPD का समय बताया जा रहा है।
ऐसे में दोपहर 1 बजे के बाद अचानक बुखार, बदन दर्द, कमजोरी या अन्य स्वास्थ्य समस्या से परेशान मरीजों को शाम की OPD का इंतजार करना पड़ सकता है। दूरस्थ आदिवासी गांवों से मैनपुर पहुंचने वाले मरीजों के लिए यह परेशानी और बढ़ जाती है।
हालांकि उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग के 19 दिसंबर 2019 के आदेश का उल्लेख है, जिसमें जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल और CHC में OPD के लिए दो शिफ्टों का प्रावधान बताया गया है। रिकॉर्ड के अनुसार निर्धारित समय मौसम के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
वायरल फीवर के बीच बढ़ी जरूरत
मैनपुर क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों वायरल फीवर, बुखार, बदन दर्द और कमजोरी जैसी शिकायतों से लोग परेशान होने की बात सामने आ रही है। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों में भी सितंबर 2026 के दौरान वायरल फीवर के मरीजों की संख्या बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
ऐसे समय में ग्रामीणों के लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर समय पर डॉक्टर और जांच की सुविधा मिलना महत्वपूर्ण हो जाता है। खासकर आदिवासी बाहुल्य और दूरस्थ गांवों में जहां अस्पताल तक पहुंचने में ही काफी समय लग जाता है।
सरकारी व्यवस्था में खाली जगह, झोलाछापों की चांदी?
यही वह स्थिति है जिसका फायदा कथित झोलाछाप डॉक्टर उठा रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार कुछ लोग गांव-गांव और घर-घर जाकर बुखार व दूसरी सामान्य बीमारियों का इलाज करने का दावा कर रहे हैं। मरीजों को मौके पर ही दवा और इंजेक्शन देने से लेकर विभिन्न तरह के उपचार किए जाने की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मरीज को सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर तत्काल चिकित्सा सुविधा नहीं मिलती, तो वह नजदीक उपलब्ध व्यक्ति के पास जाने को मजबूर हो सकता है। दूरस्थ आदिवासी इलाकों में यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, क्योंकि हर मरीज के लिए मैनपुर या बड़े अस्पताल तक पहुंचना आसान नहीं है।
बिना योग्यता इलाज का खतरा
बिना वैध चिकित्सकीय योग्यता और पंजीयन के इलाज करने वाले लोगों से उपचार कराना मरीजों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के अमलीपदर क्षेत्र में कथित झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज से जुड़े गंभीर मामलों की रिपोर्ट सामने आई है और स्वास्थ्य विभाग द्वारा जांच की बात कही गई थी।
इसलिए वायरल फीवर के मौजूदा दौर में ग्रामीणों के बीच यह सवाल महत्वपूर्ण है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होगी या मरीज मजबूरी में झोलाछापों के भरोसे जाएंगे?
दूरस्थ गांवों में बंद स्वास्थ्य केंद्र भी चिंता का विषय
मैनपुर ब्लॉक के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में संचालित आयुष्मान आरोग्य केंद्रों की उपलब्धता और नियमित संचालन को लेकर भी ग्रामीणों की शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। यदि गांव के स्तर पर ही स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं होती और मुख्यालय के अस्पताल की OPD का समय भी मरीज की जरूरत के अनुकूल नहीं बैठता, तो इसका सीधा असर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ सकता है।
विभाग को क्या करना चाहिए?
ग्रामीणों की मांग है कि वायरल फीवर के मौजूदा दौर को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग मैनपुर क्षेत्र के CHC, PHC और आयुष्मान आरोग्य केंद्रों की अचानक जांच कराए, निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति सुनिश्चित करे और जहां आवश्यकता हो वहां अतिरिक्त स्वास्थ्य शिविर लगाए।
साथ ही गांव-गांव इलाज करने वाले कथित झोलाछाप डॉक्टरों की भी जांच की जाए। यदि कोई व्यक्ति बिना वैध डिग्री या पंजीयन के चिकित्सकीय उपचार कर रहा है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ OPD के समय का नहीं है—सवाल उन ग्रामीण मरीजों का है, जो सरकारी अस्पताल बंद या अनुपलब्ध मिलने पर गलत हाथों में अपना इलाज कराने को मजबूर हो सकते हैं।




