381.728 हेक्टेयर जंगल में 1670 पेड़ों के विदोहन की योजना, 896.746 घनमीटर इमारती लकड़ी का अनुमान; ग्रामीण बोले-बीमार पेड़ों की आड़ में स्वस्थ इमारती पेड़ों पर न चले आरी
धवलपुर। एक तरफ सरकार पर्यावरण संरक्षण और बड़े पैमाने पर पौधरोपण के संदेश के साथ ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान चला रही है, वहीं गरियाबंद जिले के धवलपुर क्षेत्र में कूप विदोहन को लेकर ग्रामीणों के बीच नाराजगी सामने आ रही है। ग्रामीणों का सवाल सीधा है—जब एक पेड़ को बचाने और लगाने की बात की जा रही है, तो जंगल में खड़े बड़े पेड़ों की कटाई का सिलसिला क्यों?
धवलपुर क्षेत्र में इन दिनों कूप कटाई को लेकर ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कटाई केवल खराब या बीमार पेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि जंगल में खड़े अच्छे और इमारती उपयोग वाले पेड़ों पर भी आरी चल रही है।
हालांकि, कौन-सा पेड़ किस आधार पर कटाई के लिए चिन्हित किया गया है, इसकी पुष्टि संबंधित विभाग के चिन्हांकन रिकॉर्ड और मौके के निरीक्षण से ही हो सकती है। यही वह बिंदु है जिस पर अब ग्रामीण विभाग से स्पष्ट जवाब मांग रहे हैं।
सरकारी दस्तावेज ने सामने रखी कटाई की पूरी तस्वीर
ग्रामीणों के सवालों के बीच वन विभाग का उपलब्ध आदेश इस मामले को और महत्वपूर्ण बना देता है। मुख्य वनसंरक्षक, रायपुर वृत्त रायपुर के पत्र क्रमांक 4197, दिनांक 16 जून 2026 के संदर्भ में गरियाबंद वन मंडल द्वारा वर्ष 2026-27 में नए कूपों के विदोहन की योजना को मंजूरी देकर कार्य प्रारंभ करने की अनुमति दी गई है। दस्तावेज में कार्य 15 सितंबर 2026 से शुरू करने और 31 जनवरी 2027 तक पूरा करने का उल्लेख है।
इसी दस्तावेज में धवलपुर (सामान्य) के अंतर्गत:
- कूप: SCI C/VI धवलपुर P809, P811, P812, OA813, P814 एवं OA824
- विदोहन योग्य क्षेत्र: 381.728 हेक्टेयर
- चिन्हित वृक्षों की संख्या: 1670
- अनुमानित इमारती लकड़ी: 896.746 घनमीटर
- अनुमानित जलाऊ चट्टा: 761 घनमीटर
- विदोहन योजना के अनुसार अनुमानित व्यय: ₹65,90,511
दर्ज किया गया है।
यानी सरकारी कागज में हजारों पेड़ों के विदोहन का आंकड़ा मौजूद है। अब ग्रामीणों का सवाल इस बात पर है कि जमीन पर वास्तव में कौन-कौन से पेड़ काटे जा रहे हैं और उनके चयन का आधार क्या है।
ग्रामीण बोले-‘जंगल हमारे लिए सिर्फ लकड़ी नहीं’
धवलपुर और जंगल धवलपुर क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का भंडार नहीं है। जंगल से उन्हें जल, वनोपज, छाया, पशुओं के लिए संसाधन और जीवन-यापन का आधार मिलता है।
ग्रामीणों का कहना है कि बड़े पेड़ों को तैयार होने में दशकों लगते हैं, लेकिन उन्हें काटने में कुछ मिनट ही लगते हैं।
उनका सवाल है—
“एक पेड़ लगाने के लिए लोगों से कहा जाता है कि उसे मां के नाम पर लगाइए, लेकिन जो पेड़ हमारे सामने वर्षों में बड़े हुए हैं, उनका हिसाब किसके नाम पर होगा?”
इसी सवाल को लेकर ग्रामीण कूप कटाई की प्रक्रिया की पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं।
‘एक पेड़ मां के नाम’ और ‘हजारों पेड़ राजस्व के नाम’ का सवाल
ग्रामीणों के बीच अब यह सवाल भी चर्चा में है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाए जा रहे अभियानों और जंगल में होने वाले वैध कूप विदोहन के बीच संतुलन कैसे बनाया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी पेड़ को काटना विभागीय नियमों के तहत आवश्यक है तो हर पेड़ का वैज्ञानिक आधार और रिकॉर्ड स्पष्ट होना चाहिए।
उनकी मांग है कि कटाई से पहले:
कितने पेड़ चिन्हित हुए?
कौन-सी प्रजाति के हैं?
किस कारण से काटे जाएंगे?
पेड़ का व्यास कितना है?
कितनी लकड़ी निकलने का अनुमान है?
और कटाई के बाद वास्तविक मात्रा कितनी निकली?
इन सभी जानकारियों का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
दस्तावेज में 1670 पेड़, लेकिन ग्रामीणों की नजर मौके की कटाई पर
वन विभाग के दस्तावेज में 1670 पेड़ों का आंकड़ा दर्ज है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि असली सवाल सिर्फ संख्या का नहीं है।
सवाल यह है कि इन 1670 पेड़ों का चयन कैसे हुआ?
यदि सभी पेड़ निर्धारित तकनीकी मापदंडों के अनुसार चिन्हित किए गए हैं तो विभाग के पास प्रत्येक पेड़ का रिकॉर्ड होना चाहिए। ऐसे में ग्रामीणों की मांग है कि मौके पर चिन्हित पेड़ों और विभागीय रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए।
यदि रिकॉर्ड और जमीन पर वास्तविक कटाई में अंतर मिलता है, तो इसकी जांच और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
धवलपुर कोई सामान्य इलाका नहीं, जंगल और वन्यजीव दोनों के लिए महत्वपूर्ण
गरियाबंद जिला प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है। जिला प्रशासन के अनुसार जिले का करीब 51 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है और गरियाबंद वनमंडल का क्षेत्रफल करीब 1951.861 वर्ग किलोमीटर है। मैनपुर क्षेत्र भी सघन वन क्षेत्र के लिए जाना जाता है।
धवलपुर क्षेत्र में हाल के दिनों में हाथियों की आवाजाही को लेकर भी ग्रामीणों की चिंता सामने आई है। बौड़ापाला क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी को लेकर ग्रामीणों द्वारा फसल और जान-माल की सुरक्षा की चिंता जताई गई थी।
ऐसे में ग्रामीणों का तर्क है कि जंगल में होने वाली किसी भी कटाई का मूल्यांकन केवल लकड़ी की मात्रा के आधार पर नहीं, बल्कि वन्यजीव आवास और स्थानीय पर्यावरण को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों की मांग-एक बार मौके पर अधिकारी खुद देखें
ग्रामीणों ने मांग की है कि धवलपुर क्षेत्र में चल रही कूप कटाई की वरिष्ठ अधिकारियों की टीम बनाकर मौके पर जांच कराई जाए।
ग्रामीण चाहते हैं कि अधिकारी:
- स्वीकृत कूप की सीमा का मौके पर सत्यापन करें।
- चिन्हित पेड़ों की संख्या रिकॉर्ड से मिलाएं।
- प्रत्येक पेड़ के चिन्हांकन की जांच करें।
- स्वस्थ और खराब/बीमार पेड़ों की स्थिति स्पष्ट करें।
- कटाई के बाद निकली इमारती लकड़ी का वास्तविक माप कराएं।
- विभागीय रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का मिलान करें।
- ग्रामीणों की आपत्तियों और शिकायतों को लिखित रूप से दर्ज करें।
सवाल सिर्फ 1670 पेड़ों का नहीं, जंगल की अगली पीढ़ी का है
ग्रामीणों का कहना है कि आज काटा गया बड़ा पेड़ अगले साल लगाया गया पौधा तुरंत नहीं बन सकता। इसलिए जंगल को केवल राजस्व की दृष्टि से देखने के बजाय आने वाली पीढ़ियों के संसाधन के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
उनका कहना है कि यदि कूप विदोहन नियमों और वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार हो रहा है तो विभाग को ग्रामीणों की शंकाओं को दूर करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
और यदि मौके पर स्वीकृत योजना से अलग कोई कटाई हो रही है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
कागज में 381.728 हेक्टेयर क्षेत्र और 1670 पेड़ों का आंकड़ा दर्ज है। अब असली सवाल यही है—धवलपुर के जंगल में कागज पर दर्ज आंकड़े और जमीन पर चल रही आरी के बीच कितना मेल है?
ग्रामीण इसी सवाल का जवाब चाहते हैं।




ग्रामीण बोले-‘जंगल हमारे लिए सिर्फ लकड़ी नहीं’
‘एक पेड़ मां के नाम’ और ‘हजारों पेड़ राजस्व के नाम’ का सवाल