मैनपुर ।शिक्षा के अधिकार और बेहतर स्कूलों के सरकारी दावों के बीच गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड के दूरस्थ आदिवासी ग्राम मोतीपानी की तस्वीर सरकारी व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां पिछले चार वर्षों से प्राथमिक शाला भवन नहीं है। मजबूरी में गांव के 41 बच्चे गाय के कोठे (गोठाननुमा भवन) में पढ़ाई करने को विवश हैं। बरसात शुरू होते ही हालात और बदतर हो जाते हैं। बारिश का पानी भरने और छत टपकने से पढ़ाई प्रभावित होती है और कई बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाते। मोतीपानी मैनपुर विकासखंड का एक छोटा ग्रामीण गांव है।
2002 का भवन हुआ जर्जर, नया स्कूल आज तक अधूरा
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2002 में बने प्राथमिक शाला भवन को करीब चार वर्ष पहले जर्जर घोषित कर डिस्मेंटल कर दिया गया था। उसी समय नए भवन की स्वीकृति भी मिली, लेकिन आज तक निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। नतीजा यह है कि बच्चों की पढ़ाई अस्थायी व्यवस्था के सहारे चल रही है और उनका भविष्य अधर में लटका हुआ है।
कलेक्टर ने दिया था 15 जून तक निर्माण पूरा कराने का भरोसा
ग्रामीणों ने गोना में आयोजित सुशासन शिविर में स्कूल भवन की समस्या जिला प्रशासन के सामने उठाई थी। शिकायत सुनने के बाद जिला कलेक्टर ने आश्वासन दिया था कि 15 जून तक भवन निर्माण पूरा कराकर नए शिक्षा सत्र में बच्चों को नए स्कूल भवन में पढ़ाई शुरू कराई जाएगी। लेकिन नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद भी बच्चे आज अपने स्थायी स्कूल भवन का इंतजार कर रहे हैं।
बारिश में सबसे ज्यादा परेशानी
गांव के लोगों का कहना है कि जिस स्थान पर फिलहाल कक्षाएं लग रही हैं, वहां बारिश होते ही पानी भर जाता है। बच्चों को बैठने तक की जगह नहीं मिलती। कई अभिभावक खराब मौसम में बच्चों को स्कूल भेजने से बचते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।
‘निर्माण एजेंसियों की वजह से हुई देरी’
मामले में जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर ने कहा,
“जितनी भी कमियां हैं, वह निर्माण एजेंसियों की हैं। तत्कालिक व्यवस्था करने की पूरी कोशिश हम कर रहे हैं। गरियाबंद जिले के भौगोलिक दृष्टिकोण से हर क्षेत्र की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। कई अति संवेदनशील क्षेत्रों में ठेकेदार भवन अधूरे छोड़कर चले गए हैं, इसी वजह से भवन निर्माण पूरा नहीं हो पाया है।”
हर बार बदलते अधिकारी, नहीं बदलती व्यवस्था
प्रशासन निर्माण में देरी के पीछे संवेदनशील क्षेत्रों और ठेकेदारों के काम अधूरा छोड़ने जैसी वजहें बता रहा है। लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि यदि एक प्राथमिक स्कूल भवन बनने में ही चार वर्ष लग जाएं तो इसकी जवाबदेही आखिर किसकी होगी?
गरियाबंद जिले में अधिकारियों के लगातार तबादलों के बीच हर बार नई सफाई सामने आती है, लेकिन जमीनी स्थिति जस की तस बनी रहती है। एक अधिकारी जिले की शिक्षा व्यवस्था को समझ पाता है, तब तक उसका स्थानांतरण हो जाता है। नया अधिकारी आता है और अधूरे कार्यों के लिए फिर वही पुराने कारण गिनाए जाते हैं।
41 बच्चों का सवाल, व्यवस्था कब सुधरेगी?
मोतीपानी के 41 बच्चों की यह कहानी केवल एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहां भवनों की स्वीकृति तो मिल जाती है, लेकिन निर्माण वर्षों तक अधूरा पड़ा रहता है। ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों का होता है, जिनके बेहतर भविष्य की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन दोनों पर है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मोतीपानी के बच्चों को इस शैक्षणिक सत्र में अपना स्कूल भवन मिलेगा, या फिर एक और साल अस्थायी व्यवस्था में ही पढ़ाई करनी पड़ेगी?







