गरियाबंद। आजादी के 79 वर्ष बाद भी छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के सुदूर वनांचल राजापड़ाव क्षेत्र के हजारों आदिवासी परिवार बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। वर्षों तक आवेदन, ज्ञापन, धरना, जनसंवाद और आंदोलन करने के बाद भी समाधान नहीं मिलने पर क्षेत्रवासियों ने मंगलवार 10 जून को एक ऐतिहासिक और भावनात्मक कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम अपने खून से चिट्ठियां लिखीं।
ग्राम अड़गड़ी में आयोजित महा ग्रामसभा में हजारों की संख्या में ग्रामीण, महिलाएं, बुजुर्ग, युवा और बच्चे शामिल हुए। सभी ने अपने-अपने खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से क्षेत्र को अंधेरे से मुक्ति दिलाने और बिजली उपलब्ध कराने की मांग की। ग्रामीणों ने इसे अपनी “आखिरी लोकतांत्रिक गुहार” बताया।
बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने लिखा खून से पत्र
कार्यक्रम में ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने सभी को भावुक कर दिया। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने अपने भविष्य और अधिकारों के लिए खून से पत्र लिखे। किसी ने अपने गांव में बिजली की मांग की, तो किसी ने सड़क, स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा की व्यवस्था करने की अपील की।
ग्रामीणों का कहना था कि जब वर्षों की मांगों के बाद भी व्यवस्था नहीं बदली, तब उन्हें यह अनोखा और प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन करना पड़ा ताकि उनकी आवाज देश के सर्वोच्च नेतृत्व तक पहुंच सके।
79 साल बाद भी अंधेरे में 48 गांव
राजापड़ाव क्षेत्र उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के बफर जोन में स्थित है। यहां 8 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत लगभग 48 गांव, पारा और टोले आते हैं। ग्रामीणों के अनुसार केवल कुछ मुख्य गांवों तक सीमित रूप से बिजली पहुंची है, जबकि अधिकांश बस्तियां आज भी अंधेरे में जीवन जीने को मजबूर हैं।
मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आवागमन की सुविधाएं भी क्षेत्र के अधिकांश गांवों में पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि विकास की योजनाएं कागजों में दिखाई देती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व बना सबसे बड़ा रोड़ा
ग्रामीणों और आंदोलन से जुड़े संगठनों का आरोप है कि क्षेत्र में बिजली लाइन विस्तार, सड़क निर्माण, स्कूल भवन, आंगनबाड़ी केंद्र और अन्य विकास कार्यों के लिए अक्सर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की अनुमति और NOC को बाधा बताया जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से उन्हें यही जवाब मिलता रहा कि वन क्षेत्र और टाइगर रिजर्व से जुड़े नियमों के कारण विकास कार्य अटके हुए हैं। इसी कारण लोगों में यह धारणा बनी कि उनकी समस्याओं का समाधान केवल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री स्तर पर ही संभव है।
संघर्ष और उपेक्षा का लंबा इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब राजापड़ाव क्षेत्र के लोग अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरे हों।
कुछ माह पहले आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने भी अपनी पीड़ा व्यक्त की थी।
मोबाइल टावर लगने के बावजूद नेटवर्क सुविधा शुरू नहीं होने से लोगों को ऑनलाइन शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी सेवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है ।
पुल निर्माण कार्य बंद होने के विरोध में हजारों ग्रामीण राष्ट्रीय राजमार्ग 130-सी पर चक्का जाम कर चुके हैं। उस दौरान भी लोगों ने चेतावनी दी थी कि यदि समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन और उग्र होगा।
ग्रामसभा अधिकार और पेसा कानून पर भी जोर
महा ग्रामसभा में क्षेत्र में ग्रामसभा शिलालेख स्थापित करने का निर्णय भी दोहराया गया। इसके माध्यम से ग्रामसभा के अधिकारों, संविधान प्रदत्त शक्तियों और पेसा कानून की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की पहल की जाएगी।
ग्रामीणों का संदेश: अब सिर्फ आश्वासन नहीं, अधिकार चाहिए
सभा में उपस्थित लोगों ने कहा कि वे किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं बल्कि अपने अस्तित्व, सम्मान और बुनियादी अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि आजादी के 79 वर्ष बाद भी आदिवासी क्षेत्र बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो यह केवल विकास का नहीं बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं का भी सवाल है।
खून से लिखी गई हजारों चिट्ठियों के माध्यम से राजापड़ाव क्षेत्र के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि वे स्वयं हस्तक्षेप कर क्षेत्र को अंधेरे से बाहर निकालें और विकास की मुख्यधारा से जोड़ें।
अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि उनकी इस भावनात्मक और ऐतिहासिक गुहार पर शासन-प्रशासन तथा केंद्र सरकार की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।




79 साल बाद भी अंधेरे में 48 गांव
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व बना सबसे बड़ा रोड़ा
संघर्ष और उपेक्षा का लंबा इतिहास
