उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व प्रशासन की नई पहल, अब नहीं लगाने पड़ेंगे दफ्तरों के चक्कर
गरियाबंद | छत्तीसगढ़ के Udanti Sitanadi Tiger Reserve में मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित ग्रामीणों को अब मुआवज़े के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। टाइगर रिजर्व प्रशासन ने “गजसंकेत” ऐप को अपग्रेड कर उसे ऑनलाइन मुआवज़ा प्रबंधन प्रणाली से जोड़ दिया है। नई डिजिटल व्यवस्था के जरिए अब फसल नुकसान, मानव घायल या मृत्यु, संपत्ति क्षति और मवेशियों की हानि जैसे मामलों में प्रभावित ग्रामीणों को तेजी से राहत मिल सकेगी।
“गजसंकेत” ऐप को पहले हाथियों की गतिविधियों की अग्रिम सूचना देने और
मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। अब इसे ऑनलाइन मुआवज़ा प्रणाली से जोड़कर ग्रामीणों को बड़ी सुविधा देने की तैयारी की गई है।
बिना ऐप डाउनलोड किए मिलेगी सुविधा
नई व्यवस्था के तहत ग्रामीणों को अलग से कोई ऐप डाउनलोड करने की जरूरत नहीं होगी। वनरक्षक स्वयं मौके पर पहुंचकर ऑनलाइन दावा दर्ज करेंगे और जरूरी दस्तावेजों के साथ फोटो पोर्टल पर अपलोड किए जाएंगे। दावा प्रक्रिया के हर चरण — रेंजर, पटवारी, एसडीओ, डीएफओ और ट्रेजरी स्तर तक — SMS और WhatsApp के जरिए अपडेट भेजे जाएंगे।
प्रशासन ने दावा दर्ज होने से लेकर ट्रेजरी तक फाइल भेजने की समय-सीमा 30 दिन तय की है। इससे वर्षों से लंबित रहने वाली मुआवज़ा प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
फील्ड कर्मचारियों को दिया जा रहा प्रशिक्षण
फिलहाल इस पोर्टल का ट्रायल रन जारी है। फील्ड स्तर पर कार्यरत पटवारियों, वनरक्षकों और रेंज अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि नई व्यवस्था को सुचारु रूप से लागू किया जा सके। प्रशासन अगले महीने इसका औपचारिक शुभारंभ करने की तैयारी में है।
ग्रामीणों को मिलेगी रियल-टाइम जानकारी
नई डिजिटल प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि प्रभावित ग्रामीण अपने दावे की रियल-टाइम ट्रैकिंग कर सकेंगे। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। प्रशासन का मानना है कि इससे वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और वन विभाग के बीच भरोसा भी मजबूत होगा।
कई राज्यों ने अपनाया “गजसंकेत” मॉडल
मार्च 2023 में शुरू किए गए “गजसंकेत” ऐप को अब मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों ने भी अपनाया है। यह ऐप AI आधारित तकनीक की मदद से हाथियों की गतिविधियों की जानकारी देकर ग्रामीणों को पहले से सतर्क करता है।
वन विभाग का कहना है कि तकनीक आधारित यह पहल न केवल मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करेगी बल्कि वन्यजीव संरक्षण को भी नई दिशा देने का काम करेगी।



फील्ड कर्मचारियों को दिया जा रहा प्रशिक्षण